Ranchi : झारखंड की राजनीति इन दिनों अचानक तेज सुर्खियों में आ गई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी व विधायक कल्पना सोरेन पिछले कई दिनों से दिल्ली में मौजूद हैं। इसी बीच राज्य में सत्ता समीकरण बदलने की अटकलों ने जोर पकड़ लिया है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या झारखंड में सत्ता का नया खेल शुरू होने वाला है?
दिल्ली दौरे से बढ़ीं अटकलें
सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली प्रवास के दौरान हेमंत सोरेन की एक वरिष्ठ बीजेपी नेता से कथित मुलाकात की चर्चा है। इसके बाद से ही यह कयास लगाए जा रहे हैं कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) एनडीए के साथ किसी नए राजनीतिक समीकरण की ओर बढ़ सकता है। बिहार चुनाव में महागठबंधन की हार के बाद इन चर्चाओं को और हवा मिली है। हालांकि, अभी तक इस पर न तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की ओर से कोई बयान आया है और न ही बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने कुछ कहा है।
नए गठबंधन की चर्चाएं और राजनीतिक गणित
राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि यदि JMM एनडीए के साथ जाता है तो झारखंड की सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है। 81 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 41 सीटों की जरूरत होती है। वर्तमान में महागठबंधन के पास JMM के 34, कांग्रेस के 16, RJD के 4 और वाम दलों के 2 विधायक हैं, यानी कुल 56 सीटें।
वहीं, अटकलों के मुताबिक यदि JMM एनडीए में शामिल होता है तो नया समीकरण JMM के 34, बीजेपी के 21, LJP (रामविलास) की 1, AJSU की 1 और JDU की 1 सीट के साथ कुल 58 तक पहुंच सकता है। इस स्थिति में मौजूदा महागठबंधन सरकार के गिरने की संभावनाएं जताई जा रही हैं।
कांग्रेस ने अफवाहों को किया खारिज
इन चर्चाओं के बीच कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने साफ कहा है कि गठबंधन में किसी तरह का संकट नहीं है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री का दिल्ली दौरा केंद्र से अनुदान और योजनाओं के फॉलो-अप के लिए है, न कि किसी राजनीतिक सौदेबाजी के लिए। उन्होंने दावा किया कि सभी विधायक एकजुट हैं और सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी। साथ ही 4 दिसंबर को महागठबंधन विधायकों की बैठक बुलाने की बात भी कही गई है।
JMM का पलटवार, भाजपा पर निशाना
झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से भी इन अटकलों को खारिज किया गया है। पार्टी नेता कुणाल सारंगी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि घाटशिला उपचुनाव हारने के बाद भाजपा ‘सरेंडर मोड’ में है और रोज नए-नए राजनीतिक शिगूफे छोड़ रही है। उन्होंने दो टूक कहा कि झारखंड न झुका है और न झुकेगा।
स्थिरता या सत्ता परिवर्तन की आहट?
फिलहाल झारखंड की राजनीति में कयासों का दौर जारी है। कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं होने के बावजूद, हेमंत सोरेन और बाबूलाल मरांडी की चुप्पी ने राजनीतिक माहौल को और रहस्यमय बना दिया है। आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि झारखंड की राजनीति स्थिरता की राह पर आगे बढ़ेगी या फिर राज्य एक बार फिर बड़े सत्ता परिवर्तन का गवाह बनेगा।



