Ranchi : झारखंड की राजनीति में एक बार फिर भूचाल की आहट सुनाई दे रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के दिल्ली दौरे और भाजपा नेताओं से कथित गुप्त मुलाकात की चर्चाओं ने सत्ता समीकरण बदलने की अटकलों को हवा दे दी है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक एक ही सवाल तैर रहा है—क्या झारखंड में अब ‘नया गेम’ शुरू हो चुका है?
एक पोस्ट से बढ़ा सियासी तापमान
राजनीतिक हलचल की शुरुआत 17 नवंबर को मानी जा रही है, जब बिहार चुनाव परिणाम के तीसरे दिन भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय आलोक ने सोशल मीडिया पर लिखा था—“अब झारखंड में नया बम… हेमंत अब जीवंत होंगे।” इस एक पंक्ति ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी। वजह साफ थी—बिहार चुनाव के दौरान सीट शेयरिंग को लेकर झामुमो और महागठबंधन के बीच तनातनी पहले ही सतह पर आ चुकी थी।
बिहार चुनाव की हार और झारखंड पर असर
बिहार विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने झारखंड-बिहार सीमा से सटी 12 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा किया था, लेकिन महागठबंधन में उसे अपेक्षित तवज्जो नहीं मिली। बाद में 3 सीटों की बात सामने आई, फिर अचानक झामुमो ने बिहार चुनाव से ही दूरी बना ली। इसके बाद पार्टी ने झारखंड में गठबंधन की समीक्षा की बात कही। बिहार में महागठबंधन की करारी हार के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि इसका असर झारखंड की राजनीति पर पड़ सकता है।
दिल्ली दौरा और बढ़ती अटकलें
इसी बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन का दिल्ली में कई दिनों तक रहना और भाजपा नेताओं से कथित मुलाकात की खबरों ने सियासी सस्पेंस को और गहरा कर दिया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी की लगातार चुप्पी और हेमंत सोरेन की खामोशी ने इन अटकलों को और बल दिया।
गठबंधन में बढ़ती दूरी के संकेत
पिछले कुछ दिनों में कई घटनाएं सामने आईं, जिन्होंने गठबंधन में असहजता की ओर इशारा किया। ‘सरकार आपके द्वार’ जैसे बड़े कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी, कार्यक्रमों का रद्द होना और दुमका में फ्लाइंग इंस्टिट्यूट के उद्घाटन मंच पर कांग्रेस व राजद के मंत्रियों-विधायकों का नदारद रहना—ये सभी बातें सवाल खड़े कर रही हैं।
पोस्टर से गायब हुए सहयोगी दल
सियासी चर्चा तब और तेज हो गई जब मोरहाबादी मैदान में नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम के पोस्टरों से कांग्रेस और राजद नेताओं की तस्वीरें गायब मिलीं। पोस्टर से सहयोगी दलों के नेताओं के हटने को लेकर कांग्रेस और राजद के भीतर भी चर्चाएं शुरू हो गईं।
सियासत खुद लिख रही है कहानी
फिलहाल न तो किसी स्तर पर आधिकारिक पुष्टि है और न ही खुलकर कोई बयान सामने आया है, लेकिन घटनाक्रम लगातार संकेत दे रहे हैं कि झारखंड की राजनीति में कुछ बड़ा पक रहा है। पोस्टर हटना, मंच साझा न होना, मुख्यमंत्री की चुप्पी और दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में बढ़ती हलचल—ये सब मिलकर बता रहे हैं कि आने वाले दिन झारखंड की सियासत के लिए बेहद अहम हो सकते हैं।
अब सवाल यही है—क्या यह सब सिर्फ संयोग है या झारखंड वाकई एक नए राजनीतिक मोड़ की ओर बढ़ रहा है? राज्य की राजनीति फिलहाल जवाब का इंतजार कर रही है।



