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झारखंड में दो विश्वविद्यालयों ने वसूले 11 करोड़ रुपये, फिर भी नहीं कराए छात्रसंघ चुनाव

Ranchi : झारखंड के रांची विश्वविद्यालय (RU) और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU) में पिछले सात वर्षों में छात्रसंघ चुनाव और यूनियन फीस के नाम पर छात्रों से लगभग 11 करोड़ रुपये वसूले गए हैं, लेकिन चुनाव अब तक नहीं कराए गए। छात्रों और छात्र संगठनों का कहना है कि यह आर्थिक शोषण और लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है।

फीस वसूली और छात्रों का आक्रोश

छात्रों के अनुसार, स्टूडेंट इलेक्शन फीस के नाम पर प्रति छात्र 70 रुपये और स्टूडेंट यूनियन फीस के नाम पर 30 रुपये लिए जाते हैं। DSPMU में करीब 14,000 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं, जिनसे पिछले सात वर्षों में लगभग 98 लाख रुपये वसूले गए। रांची विश्वविद्यालय में डेढ़ लाख छात्र हैं, जिनसे लगभग 10.5 करोड़ रुपये की वसूली हुई।

छात्र संगठनों का कहना है कि इस लंबे समय तक चुनाव न कराने का मतलब है कि छात्रों का वित्तीय शोषण किया जा रहा है और उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी रोकी जा रही है

छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया

अभिषेक झा, अबुआ अधिकार मंच: “छात्रसंघ चुनाव न कराना घोटालों को छिपाने और तानाशाही बनाए रखने की साजिश है। चुनाव होने से छात्र नेतृत्व मजबूत होता है और यूनिवर्सिटी जवाबदेह बनती है।” विवेक तिर्की, अध्यक्ष, आदिवासी छात्रसंघ, DSPMU: “2019 के बाद चुनाव नहीं कराए गए, यह छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।” आरुषि वंदना, राष्ट्रीय संयोजक, NSUI: “छात्रसंघ चुनाव बिना देरी कराए जाएं। बिना लोकतंत्र यूनिवर्सिटी नहीं चल सकती।” संजना, संयुक्त सचिव, आइसा, रांची: “छात्रसंघ न होने से प्रशासन और छात्रों के बीच संवाद की खाई गहरी हो गई है।” रवि अग्रवाल, छात्रनेता, ABVP: “छात्र प्रतिनिधि मुखर होकर समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाते हैं।”

छात्रसंघ चुनाव के लाभ

छात्रों की आवाज सीधे प्रशासन तक पहुंचती है। मजबूत और संगठित छात्र नेतृत्व विकसित होता है। प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है। छात्रहित की नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है। छात्रों में लोकतांत्रिक मूल्य और नेतृत्व क्षमता का विकास होता है।

चुनाव न होने की समस्याएं

छात्रों की समस्याएं अनसुनी और अनदेखी रह जाती हैं। फीस वृद्धि, सेशन डिले और रिजल्ट की देरी पर कोई नियंत्रण नहीं रहता। छात्र प्रतिनिधि उपलब्ध नहीं होने से छात्रों का प्रतिनिधित्व नहीं होता। हॉस्टल, लाइब्रेरी, लैब, सुरक्षा और छात्रवृत्ति की समस्याएं बनी रहती हैं। विश्वविद्यालय में मनमानी, भ्रष्टाचार और गैर-जवाबदेही बढ़ती रहती है।

प्रशासन का बयान

दोनों विश्वविद्यालयों में वर्तमान में स्थायी कुलपति नहीं हैं। प्रभारी कुलपति डॉ. डीके सिंह हैं। जब उनसे छात्रसंघ चुनाव की तिथियों और फीस वसूली के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उन्हें कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जो भी दिशा-निर्देश प्राप्त होंगे, उनका अनुपालन किया जाएगा।

छात्र संगठन और विद्यार्थी अब राज्य सरकार से स्पष्ट नीति और समय-सीमा सहित चुनाव की मांग कर रहे हैं, ताकि छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल हों और विश्वविद्यालय में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

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