Ranchi: रांची में रविवार को कुड़मी समाज ने अपनी पुरानी मांगों को लेकर विशाल अधिकार महारैली का आयोजन किया। प्रभात तारा मैदान में बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति के बैनर तले आयोजित इस रैली में राज्यभर से हजारों की संख्या में महिलाएं, पुरुष और युवा शामिल हुए।
महारैली में कुड़मी (महतो) समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की बजाय अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल करने और कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान देने की मांग प्रमुख रूप से उठाई गई।
“ऐतिहासिक अन्याय खत्म होना चाहिए”
समिति के मुख्य संयोजक शीतल ओहदार ने अपने संबोधन में कहा कि यह जनसैलाब कुड़मी-महतो समाज की एकजुटता और जागरूकता का प्रमाण है। उन्होंने दावा किया कि 1931 की जनगणना से पहले झारखंड क्षेत्र में कुड़मी समुदाय एसटी सूची में शामिल था, लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया। उन्होंने इसे ऐतिहासिक अन्याय बताते हुए मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।
लोकतांत्रिक संघर्ष की बात
रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलसचिव डॉ. अमर चौधरी ने कहा कि समाज वर्षों से लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकार की मांग करता आया है। उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ी तो आंदोलन को दिल्ली तक ले जाया जाएगा।
सरकारी योजनाओं से वंचित होने का आरोप
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि एसटी दर्जा नहीं मिलने के कारण कुड़मी समाज के लोगों को शिक्षा, रोजगार और आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। उनका कहना था कि खान-पान, रहन-सहन, पर्व-त्योहार और भाषा के स्तर पर उनकी समानताएं आदिवासी समुदायों से मेल खाती हैं, फिर भी उन्हें एसटी का दर्जा नहीं दिया गया है।
विरोध और राजनीतिक असर
यह महारैली ऐसे समय में हुई है जब कुछ आदिवासी संगठनों ने कुड़मी समुदाय को एसटी में शामिल करने के प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका तर्क है कि इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। वहीं कुड़मी नेताओं ने इसे अपने अधिकारों की “जवाबी आवाज” बताया।
रैली में शामिल 18 संगठनों ने संकल्प लिया कि जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं, आंदोलन जारी रहेगा। इस आयोजन के बाद झारखंड की राजनीति में यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है।



