Ranchi : झारखंड सरकार ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी और संसाधन संपन्न बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), सदर अस्पताल, अनुमंडल अस्पताल और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों को अधिक प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए गए हैं। इससे अस्पतालों में आवश्यक सुविधाओं का विकास और मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।
स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने बताया कि अस्पतालों के संचालन में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं को दूर करने के लिए अधिकारों का विकेंद्रीकरण किया गया है। इसके तहत सभी स्वास्थ्य केंद्रों के प्रभारियों को डीडीओ (ड्राइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर) का अधिकार दिया गया है। अब वे अपने संस्थान की जरूरतों के अनुसार स्वयं निर्णय लेने के साथ-साथ निर्धारित राशि का उपयोग भी कर सकेंगे।
नई व्यवस्था लागू होने के बाद स्वास्थ्य केंद्रों के प्रभारियों को छोटे-मोटे कार्यों, आवश्यक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की खरीद या आउटसोर्स कर्मियों की नियुक्ति जैसे मामलों के लिए सिविल सर्जन की अनुमति का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इससे स्थानीय स्तर पर फैसले तेजी से होंगे और मरीजों को समय पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी।
सरकार ने मुख्यमंत्री अस्पताल संचालन एवं रख-रखाव योजना के तहत मिलने वाली राशि के उपयोग का अधिकार भी सीधे अस्पताल प्रभारियों को दे दिया है। अब उन्हें इस मद में खर्च के लिए सिविल सर्जन पर निर्भर नहीं रहना होगा और वे अपने अस्पताल की जरूरत के अनुसार राशि का उपयोग कर सकेंगे।
इस योजना के तहत राज्य सरकार हर वर्ष सदर अस्पतालों को 75 लाख रुपये, अनुमंडल अस्पतालों को 50 लाख रुपये, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और रेफरल अस्पतालों को 10 लाख रुपये, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को 5 लाख रुपये तथा स्वास्थ्य उपकेंद्र और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को 2 लाख रुपये उपलब्ध कराती है। अब इन निधियों का उपयोग संबंधित संस्थान के प्रभारी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कर सकेंगे।
इसके अलावा स्वास्थ्य केंद्र प्रभारियों को कंटीजेंसी फंड और ‘अबुआ स्वास्थ्य’ एवं आयुष्मान योजना के तहत मिलने वाली प्रोत्साहन राशि के उपयोग का अधिकार भी दिया गया है। इन संसाधनों का इस्तेमाल अस्पतालों की आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने और मरीजों को गुणवत्तापूर्ण सेवाएं उपलब्ध कराने में किया जा सकेगा।
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि इस फैसले से एक ओर सिविल सर्जनों पर प्रशासनिक बोझ कम होगा, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य संस्थानों के प्रभारी स्थानीय जरूरतों के अनुरूप त्वरित निर्णय लेकर अस्पतालों की व्यवस्था मजबूत कर सकेंगे। इससे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।


