Ranchi : झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। नई दिल्ली में आयोजित अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनकी पत्नी रूपी सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, विधायक कल्पना सोरेन और परिवार के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे।
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन सामाजिक सरोकारों से जुड़े शिक्षक थे। किशोरावस्था में पिता की हत्या के बाद उन्होंने अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना और आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से काम करना शुरू किया।

उन्होंने महाजनी प्रथा और भूमि शोषण के खिलाफ आंदोलन चलाकर व्यापक पहचान बनाई। संताल नवयुवक संघ और सोनोत संताल समाज जैसे संगठनों के माध्यम से आदिवासी समुदाय को संगठित किया तथा धनकटनी आंदोलन के जरिए उनके अधिकारों की आवाज बुलंद की। इन्हीं प्रयासों के चलते उन्हें बाद में “दिशोम गुरु” के नाम से जाना जाने लगा।
साल 1973 में विनोद बिहारी महतो और ए.के. राय के साथ मिलकर उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की और अलग झारखंड राज्य के आंदोलन को नई दिशा दी। लंबे जनसंघर्ष के बाद वर्ष 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ और बाद के वर्षों में शिबू सोरेन तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री भी बने।

राष्ट्रीय राजनीति में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वे कई बार दुमका से लोकसभा सांसद चुने गए और केंद्र सरकार में कोयला मंत्री की जिम्मेदारी भी निभाई। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी और बाद में राज्यसभा के माध्यम से संसद में सक्रिय रहे।
लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की आयु में नई दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन को झारखंड की राजनीति और आदिवासी आंदोलन के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत माना गया।
मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान उनके दशकों लंबे सार्वजनिक जीवन, आदिवासी समाज के उत्थान, सामाजिक न्याय और झारखंड की पहचान के लिए किए गए संघर्ष की राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता है। नेमरा गांव से शुरू हुई उनकी यात्रा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक तक पहुंचकर भारतीय लोकतंत्र और जन आंदोलनों के इतिहास में एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है।



