Khunti: कर्रा प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत जुर्दाग पंचायत का छोटा सा तेतरटोली गांव आज मेहनत, आत्मनिर्भरता और सामाजिक अनुशासन की अनोखी मिसाल बनकर उभर रहा है। लगभग पचास घरों और करीब ढाई सौ की आबादी वाला यह गांव किसी उद्योग या बड़े व्यवसाय से नहीं, बल्कि हाथों से बनाई जाने वाली रस्सियों के सहारे अपनी जिंदगी चला रहा है। गांव का लगभग हर परिवार प्लास्टिक बोरी के धागों से रस्सी तैयार करता है और उसे बेचकर घर-परिवार का भरण-पोषण करता है।![]()
गांव के ग्राम अध्यक्ष जोरोंग तिडू ने बताया कि गांव में रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं। इतने बड़े गांव से केवल दो लोग ही सरकारी नौकरी में हैं, जबकि इंटरमीडिएट से आगे पढ़ाई करने वाले लोगों की संख्या भी काफी कम है। इसके बावजूद गांव के लोग मेहनत को ही अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।
उन्होंने बताया कि तेतरटोली में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां रस्सी बनाने का काम नहीं होता हो। सुबह से लेकर शाम तक गांव के लोग प्लास्टिक बोरी से धागा निकालने और रस्सी बुनने में जुटे रहते हैं। गांव के बच्चे भी पढ़ाई के साथ इस काम में अपने परिवार का हाथ बंटाते हैं और उसी आमदनी से अपनी पढ़ाई का खर्च निकालते हैं। 
ग्राम अध्यक्ष ने कहा कि गांव के कुछ युवक रोज़गार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं, लेकिन जब वे वापस लौटते हैं तो फिर अपने पारंपरिक रस्सी निर्माण कार्य में लग जाते हैं। यह काम यहां के लोगों की जिंदगी और संस्कृति का हिस्सा बन चुका है।
तेतरटोली गांव की सबसे बड़ी पहचान केवल मेहनत नहीं, बल्कि यहां का सामाजिक अनुशासन भी है। गांव में न तो कोई शराब बनाता है और न ही किसी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन किया जाता है। शादी-विवाह या अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में भी शराब और मादक पदार्थों का पूरी तरह बहिष्कार किया जाता है। गांव के लोग इसे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं।
ग्रामीण मनवंत ने बताया कि वे लोग खूंटी बाजार से प्लास्टिक की बोरी खरीदकर लाते हैं। बोरी से धागा निकालने के बाद हाथों से मजबूत रस्सी तैयार की जाती है। एक व्यक्ति दिनभर में लगभग आठ से दस रस्सियां बना लेता है। इसके बाद इन्हें खूंटी और आसपास के ग्रामीण हाट-बाजारों में बेचकर जो आमदनी होती है, उसी से परिवार का गुजारा चलता है। 
वहीं गांव की बुजुर्ग महिला एम्बलेन होरो ने बताया कि इस कार्य में महिलाएं भी बराबरी से हिस्सा निभाती हैं। गांव की लगभग सभी महिलाएं रस्सी बनाने का काम करती हैं। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी समस्या बाजार की है। मेहनत से तैयार रस्सियों को बेचने के लिए उचित बाजार उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें मजबूरी में स्थानीय हाट-बाजारों में कम कीमत पर बेच देना पड़ता है। इससे मेहनत के अनुरूप आमदनी नहीं मिल पाती।
ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि उनके द्वारा तैयार रस्सियों के लिए बेहतर बाजार और बिक्री की व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, ताकि उनके उत्पादों को उचित पहचान और सही मूल्य मिल सके। उनका कहना है कि यदि सरकारी स्तर पर सहायता मिले तो यह छोटा सा गांव आत्मनिर्भरता का बड़ा उदाहरण बन सकता है। 
हालांकि गांव में सड़क, बिजली और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंच चुकी हैं। वहीं जनवितरण प्रणाली के तहत राशन, वृद्धावस्था पेंशन और अबुआ आवास योजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ भी ग्रामीणों को मिल रहा है। इसके बावजूद गांव के लोग आज भी अपनी मेहनत की डोर से ही जिंदगी को आगे बढ़ा रहे हैं।



