Bokaro: झारखंड और पूर्ववर्ती बिहार सरकार में मंत्री रह चुके वरिष्ठ नेता माधव लाल सिंह का बुधवार को निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और रांची के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज जारी था। उनके निधन की खबर सामने आते ही बोकारो जिले सहित पूरे राज्य में शोक की लहर फैल गई। राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने उनके निधन को राज्य की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर शोक संदेश जारी करते हुए लिखा कि गोमिया से पूर्व विधायक और बिहार-झारखंड सरकार में मंत्री रहे माधव लाल सिंह के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ कराया जाए।
माधव लाल सिंह गोमिया विधानसभा क्षेत्र की राजनीति का एक बड़ा और प्रभावशाली चेहरा माने जाते थे। वे अपने सरल स्वभाव, सहज व्यवहार और जनता से गहरे जुड़ाव के कारण इलाके में “माधव बाबू” के नाम से लोकप्रिय थे। आम लोगों के बीच उनकी मजबूत पकड़ थी और वे लगातार जनता के मुद्दों को उठाने के लिए पहचाने जाते थे।
जानकारी के अनुसार, कुछ दिन पहले उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। इसके बाद उन्हें बोकारो के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्वास्थ्य में सुधार नहीं होने पर डॉक्टरों ने उन्हें बेहतर इलाज के लिए रांची रेफर कर दिया। वहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था, लेकिन बुधवार सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।
राजनीतिक जीवन की बात करें तो माधव लाल सिंह ने कई दशकों तक सक्रिय राजनीति की। उन्होंने वर्ष 1985, 1990, 2000 और 2009 में गोमिया विधानसभा सीट से जीत दर्ज की थी। वे बिहार सरकार में वर्ष 2000 में कैबिनेट मंत्री बने थे और झारखंड राज्य गठन के बाद भी मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली थी। लंबे राजनीतिक अनुभव और जनाधार के कारण वे क्षेत्र की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे।
उनके निधन की खबर मिलते ही गोमिया और आसपास के क्षेत्रों में शोक का माहौल बन गया। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और उनके समर्थकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। कई नेताओं ने कहा कि माधव लाल सिंह का जीवन जनसेवा के लिए समर्पित रहा और उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
राजकीय सम्मान के साथ होने वाले उनके अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों के शामिल होने की संभावना है। उनके निधन से झारखंड की राजनीति में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ है, जिसे भर पाना आसान नहीं होगा।



