Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची एक बार फिर अपनी सांस्कृतिक विविधता और परंपराओं की रंगीन छटा में डूब गई, जब ऐतिहासिक ऑड्रे हाउस में ‘सांसद सांस्कृतिक महोत्सव-सह-स्वदेशी मेला 2026’ का शुभारंभ हुआ। तीन दिवसीय इस आयोजन का उद्घाटन राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम में स्थानीय कला, संस्कृति और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने का संदेश प्रमुखता से दिया गया।
उद्घाटन समारोह में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने ‘वोकल फॉर लोकल’ की अवधारणा को दोहराते हुए कहा कि स्वदेशी केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का प्रतीक है। उन्होंने स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि इससे न केवल आर्थिक मजबूती आती है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत भी संरक्षित रहती है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने संबोधन में झारखंड की प्रतिभाओं की सराहना करते हुए कहा कि राज्य में संसाधनों की कमी के बावजूद यहां के युवा हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार विभिन्न योजनाओं और आयोजनों के माध्यम से स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय कलाकारों को मंच देने का लगातार प्रयास कर रही है।
इस मेले में राज्यभर से आए कारीगरों और शिल्पकारों ने अपने उत्पादों की आकर्षक प्रदर्शनी लगाई है। हस्तनिर्मित वस्त्र, पारंपरिक आभूषण, बांस और मिट्टी से बने कलात्मक उत्पाद यहां के मुख्य आकर्षण हैं। इन स्टॉल्स पर लोगों की भीड़ उमड़ रही है, जो स्वदेशी उत्पादों के प्रति बढ़ती रुचि को दर्शाता है।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने मेले का निरीक्षण करते हुए विभिन्न स्टॉल्स का दौरा किया और कारीगरों से सीधे संवाद किया। उन्होंने उनके कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के मंच से उन्हें नई पहचान और बाजार मिल सकता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक लोक नृत्य और गीतों ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से झारखंड की समृद्ध लोक परंपराओं और विविधता की झलक देखने को मिली, जिसने उपस्थित लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
इस अवसर पर केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ सहित कई जनप्रतिनिधि, कलाकार और बड़ी संख्या में आम लोग मौजूद रहे। यह महोत्सव न केवल स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने का माध्यम बन रहा है, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।



