Khunti: खूंटी जिले के ऐतिहासिक जीउरी गांव को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नया मोड़ ले चुका है। बुधवार को निशा उरांव के नेतृत्व में “पारंपरिक उल्गुलान” और “सामाजिक डीलिस्टिंग” आंदोलन के तहत उपायुक्त को ज्ञापन सौंपे जाने के बाद गुरुवार को जीउरी गांव में विशेष ग्रामसभा आयोजित कर ग्राम प्रधान एवं ग्रामीणों ने निशा उरांव और उनके संगठन के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया। ग्रामसभा में उनके बयान को भ्रामक, अपमानजनक और गांव की ऐतिहासिक गरिमा के खिलाफ बताया गया। 
विशेष ग्रामसभा की अध्यक्षता करते हुए ग्राम प्रधान बिनसाय मुंडू ने कहा कि जीउरी गांव एक बकास्त मुंडारी खूंटकट्टी गांव है, जिसकी ऐतिहासिक पहचान और गौरवशाली विरासत को तोड़-मरोड़ कर पेश करना निंदनीय है। उन्होंने कहा कि जीउरी गांव आदिवासी परंपरा, संघर्ष और शहादत का प्रतीक रहा है तथा इसका इतिहास बिरसा उलगुलान से गहराई से जुड़ा है।
ग्राम प्रधान ने बताया कि 9 जनवरी 1900 को बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए ऐतिहासिक संघर्ष के दौरान जीउरी गांव की तीन वीर महिलाएं शहीद हुई थीं। उनका बलिदान केवल गांव ही नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक है। ऐसे गांव के इतिहास पर बिना तथ्यात्मक जानकारी के टिप्पणी करना समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला है। 
पहले इतिहास जानें, फिर बयान दें
ग्राम प्रधान बिनसाय मुंडू ने निशा उरांव के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी को जीउरी गांव के इतिहास की जानकारी नहीं है, तो पहले डोम्बारी बुरु जाकर ऐतिहासिक तथ्यों को समझना चाहिए, न कि बिना प्रमाण समाज में भ्रम फैलाना चाहिए। उन्होंने कहा कि गांव और शहीदों की छवि धूमिल करने का किसी को अधिकार नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के बयान आदिवासी समाज में विभाजन, भ्रम और तनाव पैदा करते हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है जो व्यक्ति स्वयं आदिवासी परंपराओं और सामाजिक मर्यादाओं का पालन नहीं करता, उसे समाज के विषय में टिप्पणी करने का नैतिक अधिकार नहीं है।
निशा उरांव की भूमिका पर उठे सवाल
ग्राम प्रधान ने सवाल किया कि निशा उरांव किस हैसियत से ऐसे बयान दे रही हैं। उन्होंने पूछा कि क्या वे किसी प्रशासनिक पद पर हैं या किसी राजनीतिक दल की प्रतिनिधि हैं? यदि वे किसी जिम्मेदार भूमिका में हैं, तो उन्हें समाज में एकता और समरसता कायम रखने का प्रयास करना चाहिए, न कि विवाद उत्पन्न करने वाला बयान देना चाहिए।
विरोध प्रदर्शन और पुतला दहन का निर्णय
विशेष ग्रामसभा में यह निर्णय लिया गया कि निशा उरांव के विरोध में आदिवासी समाज सड़क पर उतरेगा और उनका पुतला दहन कर विरोध दर्ज कराया जाएगा। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि राजनीतिक जमीन न मिलने के कारण निशा उरांव खूंटी में आदिवासियों को आपस में लड़ाने का प्रयास कर रही हैं, जिसे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, बुधवार को खूंटी में निशा उरांव के नेतृत्व में दर्जनों समर्थकों ने उपायुक्त आर. रोनिटा को ज्ञापन सौंपकर “पारंपरिक उल्गुलान” और “सामाजिक डीलिस्टिंग” आंदोलन की शुरुआत की थी। ज्ञापन में कहा गया था कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के आदिवासी समाज अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए यह आंदोलन चला रहे हैं। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया था कि यह संघर्ष अब तीर-धनुष से नहीं, बल्कि संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत लड़ा जाएगा।
ज्ञापन में जीउरी ग्रामसभा को लेकर आरोप लगाया गया था कि जीउरी मॉडल ग्रामसभा और नई संयुक्त पड़हा संरचना गैर-पारंपरिक है, जिसके खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाई जाएगी और संविधान प्रदत्त अधिकारों के तहत न्याय की मांग की जाएगी। 
सामाजिक बहस का केंद्र बना जीउरी
निशा उरांव के आंदोलन और जीउरी ग्राम प्रधान की तीखी प्रतिक्रिया के बाद यह विवाद अब सामाजिक और ऐतिहासिक पहचान के बड़े प्रश्न में बदलता दिख रहा है। स्थानीय स्तर पर यह मामला आदिवासी समाज के भीतर इतिहास, परंपरा, नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस छेड़ चुका है। आने वाले दिनों में यह विवाद और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर अडिग नजर आ रहे हैं।



