Khunti: झारखंड के खूंटी जिले में आदिवासी जमीन के कथित अवैध हस्तांतरण को लेकर सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों का आक्रोश फूट पड़ा। आदिवासी समन्वय समिति के बैनर तले मंगलवार को जिला मुख्यालय के समक्ष “जल, जंगल, जमीन बचाओ” के नारे के साथ विशाल धरना-प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस दौरान जिले के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग और संगठन के प्रतिनिधि शामिल हुए। 
धरना के बाद एक प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त को विस्तृत ज्ञापन सौंपकर मामले में तत्काल हस्तक्षेप और कार्रवाई की मांग की। प्रतिनिधिमंडल में संरक्षक भोला पाहन, संयोजक बिंसाय मुंडा, मार्शल बारला, चंद्र प्रभात मुंडा, विश्वकर्मा उरांव, मंगू मुंडा, दामु मुंडा और जॉनसन होरो सहित अन्य शामिल थे। ज्ञापन की प्रतिलिपि राज्यपाल और मुख्यमंत्री को भी भेजी गई है।
ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि जिले में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) की धारा-46(ए) और पेसा कानून 1996 के प्रावधानों का खुलेआम उल्लंघन करते हुए बड़े पैमाने पर आदिवासी जमीन का गैर-कानूनी हस्तांतरण किया जा रहा है। इसमें जमीन दलालों, भू-माफियाओं और कुछ स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत का भी आरोप लगाया गया है। 
संगठनों का कहना है कि आदिवासी रैयतों को डराकर, बहला-फुसलाकर और फर्जी दस्तावेजों के जरिए “सादा पट्टा” पर जमीन की खरीद-बिक्री की जा रही है, जो पूरी तरह अवैध है। यह स्थिति अब स्थानीय समुदाय के अस्तित्व और अधिकारों के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है।
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि पेसा कानून के तहत ग्रामसभा को गैर-कानूनी भूमि हस्तांतरण रोकने और जमीन की वापसी का अधिकार प्राप्त है, लेकिन प्रशासन कई मामलों में ग्रामसभा की अनुमति के बिना ही कार्रवाई कर रहा है, जो कानून का उल्लंघन है।

खूंटी जिले के 156 खुटकट्टी गांवों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन क्षेत्रों में जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर समुदाय का पारंपरिक अधिकार है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के समता (1997) और नियमगिरी (2013) फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि अनुसूचित क्षेत्रों में सरकार जमीन की मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक होती है, बावजूद इसके सामुदायिक जमीन को सरकारी बताकर बंदोबस्ती किए जाने के आरोप लगाए गए हैं।
धरना को संबोधित करते हुए मार्शल बारला ने कहा कि “जल, जंगल और जमीन” का मुद्दा आज सबसे बड़ा सवाल बन गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि रांची की तर्ज पर अब खूंटी में भी जमीन माफिया सक्रिय हो गए हैं और अधिकारियों की मिलीभगत से आदिवासियों की जमीन की खरीद-बिक्री की जा रही है।
वहीं चंद्र प्रभात मुंडा ने कहा कि सरकार ने आदिवासी जमीन की सुरक्षा के लिए CNT एक्ट जैसे कई कानून बनाए हैं, लेकिन हाल के दिनों में ऑनलाइन प्रक्रिया के जरिए जमीन की प्रकृति बदलकर अवैध खरीद-बिक्री की जा रही है। इससे न केवल आदिवासी बल्कि मूलवासी समुदाय भी प्रभावित हो रहा है और सामाजिक सौहार्द पर भी असर पड़ रहा है। 
मुख्य मांगें:
- जमीन हस्तांतरण से पहले ग्रामसभा की अनिवार्य अनुमति सुनिश्चित की जाए
- अवैध हस्तांतरण रोकने के लिए विशेष टास्क फोर्स का गठन हो
- लंबित मामलों का शीघ्र निष्पादन कर जमीन वापस दिलाई जाए
- पेसा कानून 1996 और CNT एक्ट का सख्ती से पालन कराया जाए
- 24 दिसंबर 1997 के बाद हुए संदिग्ध बंदोबस्त रद्द किए जाएं
प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही इस गंभीर मुद्दे पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। वहीं उपायुक्त ने प्रतिनिधिमंडल को समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया है।



