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सारंडा में नक्सलियों की आर्थिक घेराबंदी: लॉजिस्टिक सपोर्ट पर ब्रेक, मैन-टू-मैन मार्किंग शुरू

Ranchi: सारंडा के घने जंगलों में 22 जनवरी 2026 को हुए बड़े एनकाउंटर के बाद सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के खिलाफ अभियान और तेज कर दिया है। इस मुठभेड़ में एक करोड़ के इनामी शीर्ष कमांडर अनल उर्फ पतिराम मांझी समेत 17 नक्सली मारे गए थे। इसके बाद अब रणनीति सीधे टकराव से आगे बढ़कर आर्थिक और नेटवर्क घेराबंदी की ओर मोड़ दी गई है।

लॉजिस्टिक सपोर्ट पर सख्त वार

झारखंड पुलिस और केंद्रीय बलों ने नक्सलियों तक पहुंचने वाली रसद पर पूरी तरह ब्रेक लगाने की रणनीति अपनाई है। अनाज, दवाइयां, कपड़े और अन्य जरूरी सामान की सप्लाई रोकने के लिए समर्थकों और मददगारों की पहचान कर छापेमारी की जा रही है। जंगलों में बने बंकरों से सामग्री जब्त कर नष्ट की जा रही है।

आईजी अभियान Dr. Michael Raj ने बताया कि नक्सलियों की लॉजिस्टिक सपोर्ट लाइन को तोड़ना प्राथमिक लक्ष्य है। समर्थकों पर निगरानी बढ़ा दी गई है और कार्रवाई जारी है।

मैन-टू-मैन मार्किंग की नई रणनीति

नक्सलियों की गतिविधियां सीमित होने के बाद अब “मैन-टू-मैन मार्किंग” शुरू की गई है। यानी जंगल में छिपे बड़े इनामी नक्सलियों तक कौन पहुंच रहा है, कौन उन्हें मदद दे रहा है—इन सभी कड़ियों को गुप्त रूप से चिन्हित किया जा रहा है। विशेष टीमें गठित की गई हैं और COBRA व अन्य केंद्रीय बल ठिकाने की सूचना मिलते ही घेराबंदी के लिए तैयार हैं।

अब दो बड़े इनामी शेष

कोल्हान क्षेत्र में पहले तीन एक करोड़ के इनामी कमांडर सक्रिय थे। 22 जनवरी की कार्रवाई में एक ढेर हो चुका है। अब शीर्ष माओवादी नेता मिसिर बेसरा और असीम मंडल (दोनों पर एक-एक करोड़ का इनाम) समेत करीब 45 हार्डकोर कैडर सारंडा और कोल्हान में छिपे बताए जा रहे हैं।

आत्मसमर्पण का प्रस्ताव और जागरूकता अभियान

पुलिस ने नक्सलियों को आत्मसमर्पण का प्रस्ताव भी दिया है और राज्य की सरेंडर नीति का लाभ दिलाने का भरोसा जताया है। परिवारों से संपर्क कर समझाने की कोशिश की जा रही है कि समर्पण ही सुरक्षित रास्ता है। ग्रामीणों को भी जागरूक किया जा रहा है कि वे किसी तरह का सहयोग न करें।

करीब 15,000 जवानों की तैनाती के बीच सारंडा की घेराबंदी मजबूत की गई है। सुरक्षा एजेंसियों का लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक इस क्षेत्र को पूरी तरह नक्सल मुक्त करना है।

साफ है कि अब लड़ाई सिर्फ जंगल में नहीं, बल्कि सप्लाई लाइन और नेटवर्क पर भी लड़ी जा रही है—और यही रणनीति नक्सलियों पर निर्णायक दबाव बना रही है।

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