Deoghar: देवघर नगर निगम चुनाव को लेकर शहर का सियासी तापमान इन दिनों चरम पर है। गली-गली और वार्ड-वार्ड प्रत्याशी मतदाताओं से संपर्क साध रहे हैं। कहीं हाथ जोड़कर समर्थन मांगा जा रहा है तो कहीं नुक्कड़ सभाओं के जरिए माहौल बनाया जा रहा है। लेकिन इस बार चुनावी शोर में परंपरा की अलग ही गूंज सुनाई दे रही है।
डिजिटल पोस्टर, सोशल मीडिया कैंपेन और डीजे की धुनों के बीच ढोल-नगाड़ों की थाप शहर की सियासत को सांस्कृतिक रंग दे रही है। मेयर पद के प्रत्याशी बाबा बलियासे उर्फ नागेंद्र नाथ बलियासे अपने प्रचार अभियान में पारंपरिक वाद्य यंत्रों का सहारा ले रहे हैं। उनके समर्थन में शहर की गलियों में ढोल-नगाड़ों की गूंज लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही है।
देवघर, जो बाबा बैद्यनाथ धाम के कारण देशभर में प्रसिद्ध है, वहां ढोल-नगाड़ों का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रहा है। धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर सामाजिक आयोजनों तक, हर शुभ कार्य की शुरुआत इन वाद्यों की थाप से होती है। पारंपरिक गायक वासुदेव तूरी का कहना है कि भले ही आधुनिक दौर में डीजे और बैंड-बाजा का चलन बढ़ा हो, लेकिन आस्था और संस्कृति से जुड़े आयोजनों में आज भी ढोल-नगाड़ा ही सबसे शुभ माना जाता है।
वासुदेव तूरी जैसे कलाकारों के लिए चुनावी मौसम रोजगार का अवसर भी लेकर आता है। बदलते समय में पारंपरिक कलाकारों के सामने आजीविका की चुनौती बढ़ी है, ऐसे में चुनाव प्रचार उनके लिए सहारा साबित हो रहा है। सिर्फ एक प्रत्याशी ही नहीं, बल्कि कई उम्मीदवार पारंपरिक वाद्य यंत्रों के जरिए मतदाताओं तक पहुंच बना रहे हैं।
पुराने विचारों वाले मतदाता इस तरह के प्रचार से अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं। यह तरीका सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के साथ-साथ भावनात्मक रिश्ता भी स्थापित करता है। देवघर की सियासत में इस बार आधुनिकता और परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है, जहां वादों के साथ ढोल-नगाड़ों की थाप भी चुनावी रंग घोल रही है।


