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टाइगर एस्टीमेशन में झारखंड सबसे आगे, पलामू ने पूरा किया दो चरण का काम

Palamu: देशभर में चल रहे टाइगर एस्टीमेशन के बीच झारखंड ने बढ़त बना ली है। 15 दिसंबर से शुरू हुई इस प्रक्रिया में राज्य ने पहले और दूसरे चरण का कार्य पूरा कर लिया है, जबकि तीसरे चरण की शुरुआत हो चुकी है। चार चरणों में होने वाली यह गिनती जून 2026 तक पूरी की जानी है।

पूरे राज्य में बाघों की गणना का नेतृत्व Palamu Tiger Reserve कर रहा है। यह देश का पहला टाइगर रिजर्व बन गया है जिसने पहले दो चरण का काम समय पर पूरा कर डेटा Wildlife Institute of India को भेज दिया है।

पलामू टाइगर रिजर्व के निदेशक सह मुख्य वन संरक्षक एस.आर. नटेश राज्य स्तर पर नोडल अधिकारी हैं, जबकि डिप्टी डायरेक्टर प्रजेशकांत जेना रिजर्व क्षेत्र की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। तीसरे चरण में कैमरा ट्रैपिंग का काम शुरू हो चुका है और इसे राज्य के अन्य वन क्षेत्रों में भी विस्तारित किया जाएगा।

चौंकाने वाली जानकारी भी आई सामने

टाइगर एस्टीमेशन के दौरान केवल बाघ ही नहीं, बल्कि अन्य मांसाहारी वन्यजीवों की भी गिनती हो रही है। झारखंड के लगभग सभी वन क्षेत्रों में तेंदुओं की मौजूदगी के साक्ष्य मिले हैं। अकेले पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र में करीब 150 तेंदुओं की उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं।

बाघों की बात करें तो पलामू, गढ़वा, लातेहार, हजारीबाग और चतरा जिलों में बाघों की मौजूदगी के संकेत मिले हैं। पलामू टाइगर रिजर्व में फिलहाल लगभग छह बाघों के होने की जानकारी सामने आई है।

बाघों की संख्या में उतार-चढ़ाव

पलामू टाइगर रिजर्व का गठन 1972-73 में हुआ था और यह देश के शुरुआती संरक्षित टाइगर रिजर्व में शामिल रहा है। 2006 में यहां 10 बाघ दर्ज किए गए थे। 2014 में यह संख्या घटकर तीन रह गई और 2018 में शून्य हो गई थी।

हालांकि 2023 में तीन बाघों की पुष्टि हुई और 2025 के अनुमान में यह संख्या बढ़कर छह बताई गई है। इसे संरक्षण प्रयासों की सकारात्मक उपलब्धि माना जा रहा है।

बड़े स्तर पर तैनाती

राज्य में टाइगर एस्टीमेशन के लिए लगभग 1600 वनकर्मियों को लगाया गया है। पलामू क्षेत्र में 110 फॉरेस्ट गार्ड और बड़ी संख्या में फील्ड स्टाफ तैनात हैं। पूरे झारखंड को पांच जोन और 36 डिविजन में बांटकर वैज्ञानिक तरीके से गिनती की जा रही है।

वन विभाग का मानना है कि इस व्यापक और वैज्ञानिक सर्वेक्षण से न केवल बाघों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की भविष्य की रणनीति भी तय करने में मदद मिलेगी।

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