Ranchi: राजधानी रांची के एसडीसी के प्रांगण हॉल में मंगलवार को आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान परिषद के प्रतिनिधि ग्लैडसन डुंगडुंग, बिनसाय मुंडू और मोनिका मुंडू ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत एवं नगरपालिका कानूनों को लागू करना भारतीय संविधान के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।
नेताओं ने कहा कि झारखंड सरकार द्वारा झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 और झारखंड नगरपालिका अधिनियम 2011 को अनुसूचित क्षेत्रों में लागू कर संविधान के अनुच्छेद 243(एम) और 243(जेड)(सी) की अनदेखी की जा रही है। इन अनुच्छेदों में स्पष्ट है कि संविधान के भाग-9 और भाग-9(क) के प्रावधान अनुसूचित क्षेत्रों में स्वतः लागू नहीं होते। इन क्षेत्रों के लिए संसद द्वारा पेसा कानून 1996 बनाया गया है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने पेसा झारखंड नियमावली 2025 के माध्यम से राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों को पेसा कानून 1996 से ऊपर रखने का प्रयास किया है, जो पूरी तरह असंवैधानिक है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देकर अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निकायों का गठन किया जा रहा है, जबकि संविधान की पांचवीं अनुसूची में इसके स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं।
ग्लैडसन डुंगडुंग, बिनसाय मुंडू और मोनिका मुंडू ने कहा कि पेसा कानून का सही तरीके से पालन नहीं होने के कारण अनुसूचित क्षेत्रों में बाहरी लोगों का दखल लगातार बढ़ रहा है। इसके चलते आदिवासियों को नौकरी, जमीन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित होना पड़ रहा है। पेसा कानून के तहत एकल पदों पर आदिवासियों के लिए 100 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन इसका पालन नहीं किया जा रहा है।
आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद ने महामहिम राज्यपाल से मांग की कि वे संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा 5(1) के तहत प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 और झारखंड नगरपालिका अधिनियम 2011 को अनुसूचित क्षेत्रों से निरस्त करें। साथ ही पैरा 5(2) के तहत नियम बनाकर अनुसूचित क्षेत्रों में बाहरी लोगों के निवास, नौकरी और व्यवसाय पर रोक लगाई जाए।
परिषद ने यह भी स्पष्ट किया कि आदिवासियों के लिए बने विशेष संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ निजी आर्थिक और राजनीतिक हितों के लिए चुनाव लड़ने वालों को आदिवासी विरोधी माना जाएगा। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बड़ी संख्या में परिषद के सदस्य और आदिवासी समाज के बुद्धिजीवी वर्ग के लोग उपस्थित रहे।



