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झारखंड में हाथी–मानव संघर्ष गंभीर, हर साल 80 से 100 लोगों की मौत

Khunti : झारखंड के विभिन्न जिलों में हाथियों के हमलों में जान गंवाने वालों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। खासकर कोल्हान, संताल परगना और पलामू प्रमंडल में हालात बेहद चिंताजनक हो गए हैं। हाथियों से होने वाली मौतों के मामलों में रांची जिला सबसे अधिक प्रभावित है, जहां अब तक सबसे ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है।

वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में औसतन हर वर्ष 80 से 100 लोगों की मौत हाथियों के हमलों में हो रही है। रांची के बुंडू–तमाड़ क्षेत्र के अलावा लोहरदगा, लातेहार और गिरिडीह जिले इस संकट से सबसे ज्यादा जूझ रहे हैं। हाथियों के झुंड न केवल किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि रात के समय गांवों में घुसकर घरों को भी ध्वस्त कर रहे हैं। इस कारण ग्रामीणों को रातें जागकर बिताने को मजबूर होना पड़ रहा है।

मानव–हाथी संघर्ष का असर केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले आठ वर्षों में करीब 60 हाथियों की भी मौत हो चुकी है। इनमें से अधिकांश मौतें रेलवे लाइन से टकराने या खेतों में लगाए गए बिजली के तारों की चपेट में आने से हुई हैं। ग्रामीण हाथियों से फसलों की रक्षा के लिए करंट युक्त तार लगाते हैं, जिससे हाथियों की जान चली जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों के आक्रामक होने के पीछे कई कारण हैं। अवैध उत्खनन और तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण हाथियों के प्राकृतिक गलियारे नष्ट हो रहे हैं, जिससे उनके रहने की जगह सिमटती जा रही है। जंगलों में भोजन और पानी की कमी भी एक बड़ा कारण है, जिसके चलते हाथी गांवों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें फसलें और अनाज आसानी से मिल जाता है।

इसके अलावा रेलवे लाइन और चौड़ी सड़कों के निर्माण ने हाथियों के पारंपरिक मार्गों को बाधित कर दिया है। इससे वे भटककर रिहायशी इलाकों में पहुंच जाते हैं और जान–माल का नुकसान होता है। हाथियों का उत्पात किसानों के लिए भारी आर्थिक संकट भी खड़ा कर रहा है, क्योंकि उनकी साल भर की मेहनत कुछ ही मिनटों में नष्ट हो जाती है और मुआवजे की प्रक्रिया भी जटिल रहती है।

हाथी–मानव संघर्ष को कम करने के लिए वन विभाग कई पहल कर रहा है। हाथियों को जंगलों में ही रोकने के उद्देश्य से ‘एलीफेंट विलेज’ योजना के तहत तालाबों और चारे के पौधों का रोपण किया जा रहा है। इसके साथ ही क्विक रिस्पांस टीम (QRT) की तैनाती की गई है, जो हाथियों को आबादी वाले क्षेत्रों से दूर भगाने का कार्य करती है। ग्रामीणों को हाथियों के व्यवहार और उनसे बचाव के तरीकों को लेकर जागरूक करने के लिए अभियान भी चलाए जा रहे हैं।

पूर्व पीसीसीएफ (वन्य प्राणी) एके सिंह का कहना है कि हाथियों से होने वाली कई मौतें मानवीय नादानी का नतीजा होती हैं। लोग उत्सुकता या भय के कारण हाथियों के बहुत करीब चले जाते हैं, जिससे दुर्घटनाएं होती हैं। उन्होंने कहा कि हाथियों को उनके स्वभाव के अनुसार जीने देना चाहिए और उनके नजदीक जाने से बचना चाहिए। साथ ही यदि संपत्ति और फसल क्षति का मुआवजा समय पर और संतोषजनक रूप से मिले, तो ग्रामीण भी हाथियों को भगाने जैसी गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे।

हाल ही में पश्चिमी सिंहभूम जिले से एक दर्दनाक घटना सामने आई है। शुक्रवार की रात चाईबासा–गोइलकेरा मार्ग स्थित सैयतवा वन क्षेत्र में एक हाथी ने खलिहान में सो रहे 13 वर्षीय बालक को कुचलकर मार डाला। मृतक की पहचान गोइलकेरा के बाइपी गांव निवासी रेगा कयोम के रूप में हुई है। इसी घटना में 10 वर्षीय एक बच्ची गंभीर रूप से घायल हो गई, जिसके दोनों पैर जख्मी हैं और उसका इलाज चक्रधरपुर अस्पताल में चल रहा है।

वन विभाग के अनुसार, झारखंड के करीब 480 गांव सीधे तौर पर हाथी–मानव संघर्ष से प्रभावित हैं, जिनमें अकेले रांची जिले के 156 गांव शामिल हैं। आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि यदि समय रहते ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या आने वाले दिनों में और भयावह रूप ले सकती है।

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