Ranchi : झारखंड में बाल संरक्षण और पुनर्वास व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हुए हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान ने प्रशासनिक तंत्र पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि कई बच्चियां घर जाना चाहती हैं, उनके माता–पिता भी लेने को तैयार हैं, फिर भी उन्हें जटिल प्रक्रियाओं के कारण वापस नहीं भेजा जा रहा। यह स्थिति न केवल अव्यवस्था को दर्शाती है, बल्कि बच्चों के अधिकारों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
प्रेमाश्रय का औचक निरीक्षण—व्यवस्थाओं और बच्चों की स्थिति की विस्तृत समीक्षा
मुख्य न्यायाधीश ने रांची स्थित प्रेमाश्रय (नाबालिग लड़कियों के लिए संचालित गृह) का औचक निरीक्षण किया। उन्होंने वहां रहने, खाने, सुरक्षा और सामान्य सुविधाओं की विस्तार से समीक्षा की। सभी बच्चियों से व्यक्तिगत रूप से बात कर उनकी समस्याएं सुनीं। कई बच्चियों ने स्पष्ट रूप से बताया कि वे अपने घर वापस जाना चाहती हैं, लेकिन प्रशासनिक औपचारिकताओं के चलते वे अभी भी गृह में ही रुकी हुई हैं।
चीफ जस्टिस ने सख्त शब्दों में कहा कि जब बच्ची और उसके अभिभावक दोनों तैयार हैं, तो अनावश्यक प्रक्रिया बनाकर उन्हें रोका नहीं जा सकता। ऐसे मामलों में प्रक्रिया सरल, मानवीय और त्वरित होनी चाहिए।
जहां अभिभावक उपलब्ध नहीं—वहां भी जरूरी कदम उठाने के निर्देश
निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि कुछ बच्चियां अपने घर या परिजनों के बारे में सही जानकारी नहीं दे पा रही हैं। ऐसे मामलों में परिवार की खोज और पुनर्वास प्रक्रिया को और अधिक व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। भोजन, स्वच्छता और सुरक्षा संबंधी व्यवस्था संतोषजनक पाई गई। चीफ जस्टिस ने खुद भोजन का स्वाद चखकर गुणवत्ता की भी जांच की और अधीक्षक की व्यवस्थाओं की सराहना की।
विशेष आवश्यकता वाली बच्चियों के लिए संस्थान की कमी—तत्काल रिपोर्ट मांगी
डालसा सचिव ने कहा कि विशेष आवश्यकता वाली बच्चियों को रखने में कठिनाइयां हो रही हैं क्योंकि रांची में इस समय उनके लिए कोई पृथक संस्थान उपलब्ध नहीं है। इस पर चीफ जस्टिस ने विस्तृत प्रतिवेदन देने का निर्देश दिया, ताकि उचित समाधान तय किया जा सके।
महिला टीम गठित करने और पुनर्वास में विलंब रोकने के निर्देश
चीफ जस्टिस ने डालसा सचिव को महिला अधिकारियों की एक टीम गठित करने को कहा, जो प्रत्येक बच्ची से अलग–अलग वार्ता कर उनकी वास्तविक जरूरतों और समस्याओं का समाधान सुनिश्चित करे। जिला बाल संरक्षण अधिकारी को निर्देश दिया गया कि पुनर्वास प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए। जिन बच्चियों के अभिभावक उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें समयबद्ध तरीके से फॉस्टर केयर या अन्य उपयुक्त विकल्पों में भेजा जाए।
निरीक्षण के दौरान हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल एस.के. सिन्हा, जुवेनाइल जस्टिस कमेटी के सदस्य, रांची कोर्ट के जज और अन्य न्यायिक अधिकारी उपस्थित रहे। यह निरीक्षण राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को बच्चों के अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।



