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Ghatshila Bypoll 2025: घाटशिला में चलेगा ‘तीर’ या खिलेगा ‘कमल’? झामुमो और भाजपा में कांटे की टक्कर

Ranchi : झारखंड की राजनीति में इस समय सबसे चर्चित सीट घाटशिला विधानसभा उपचुनाव की है, जहां सत्तारूढ़ झामुमो (JMM) और भाजपा (BJP) के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है, वहीं भाजपा इस उपचुनाव को 2024 लोकसभा में मिली हार का जवाब साबित करने के रूप में देख रही है।

इस सीट का जातीय और सामाजिक समीकरण दोनों दलों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। घाटशिला क्षेत्र में करीब 45% आदिवासी और 45% ओबीसी मतदाता हैं। इनमें कुड़मी-कुरमी समुदाय की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है, जिनकी संख्या करीब 15 से 20 हजार के बीच बताई जाती है। शेष मतदाता सामान्य और अल्पसंख्यक वर्ग से हैं। यही कारण है कि इस सीट का गणित बेहद जटिल है और यह किसी भी ओर झुक सकता है।

दिवंगत मंत्री रामदास सोरेन के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर झामुमो ने उनके बेटे सोमेश चंद्र सोरेन को प्रत्याशी बनाया है। दूसरी ओर भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन को मैदान में उतारा है। दोनों उम्मीदवार संताल समाज से आते हैं, इसलिए यह माना जा रहा है कि आदिवासी मत दोनों दलों में बंट सकते हैं। भाजपा अपने सहयोगी लोजपा (LJP) के सहारे दलित वोटों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि झामुमो अल्पसंख्यक और महिला मतदाताओं को साधने में जुटा है।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि घाटशिला का उपचुनाव पूरी तरह से भावनात्मक और जातीय समीकरण पर निर्भर करेगा। झामुमो सुरजमणि सोरेन के नेतृत्व में “सहानुभूति कार्ड” खेल रही है, जबकि भाजपा बड़े नेताओं के रोड शो और रैलियों से माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के प्रचार अभियान में बाबूलाल मरांडी, शिवराज सिंह चौहान, मिथुन चक्रवर्ती, और शुवेंदु अधिकारी जैसे दिग्गज उतरने वाले हैं।

कुड़मी-कुरमी समुदाय की एसटी में शामिल किए जाने की मांग भी इस चुनाव का बड़ा मुद्दा बन चुकी है। आदिवासी संगठनों के विरोध के चलते झामुमो का पारंपरिक वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। वहीं भाजपा इस मुद्दे को भुनाने की पूरी कोशिश में है।

अब सबकी नजरें 11 नवंबर को होने वाले मतदान पर टिकी हैं। कुल 2,55,823 मतदाता और 300 से अधिक बूथों पर होने वाला यह उपचुनाव यह तय करेगा कि इस बार घाटशिला में तीर निशाने पर लगता है या कमल खिलता है। परिणाम न सिर्फ हेमंत सोरेन सरकार की साख तय करेगा, बल्कि 2026 के राजनीतिक समीकरणों को भी नई दिशा देगा।

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