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झारखंड की राजनीति में हलचल: तेज़तर्रार नेत्री निशा भगत JLKM से छह साल के लिए निष्कासित।

Ranchi: झारखंड की राजनीति में तेज़तर्रार छवि रखने वाली महिला नेत्री निशा भगत एक बार फिर सुर्खियों में हैं। कांग्रेस महिला मोर्चा झारखंड प्रदेश की पूर्व उपाध्यक्ष रह चुकीं निशा भगत ने कुछ साल पहले पार्टी बदलकर जयराम महतो की पार्टी झारखंड लोक तांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) का दामन थामा था। यहां उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और गुमला विधानसभा क्षेत्र से 2024 के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार के रूप में मैदान में भी उतरीं। हालांकि चुनावी किस्मत उनका साथ नहीं दे सकी और उन्हें जीत नसीब नहीं हुई।

आंदोलन और सक्रियता से बनी पहचान

पार्टी में रहते हुए निशा भगत ने कई सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर जोरदार आंदोलन किए। उनकी छवि एक जुझारू और मुखर नेत्री की रही है। आदिवासी समाज के सवालों को लेकर वे लगातार आवाज़ बुलंद करती रही हैं।

विवादित बयान बना वजह

हाल ही में JLKM ने निशा भगत को छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया। इसकी वजह उनके उस बयान को बताया जा रहा है, जो उन्होंने कुर्मी समाज के आंदोलन पर दिया था। दरअसल, कुर्मी समाज केंद्र और राज्य सरकार से यह मांग कर रहा है कि उन्हें आदिवासी का दर्जा दिया जाए और आदिवासी समूह में शामिल किया जाए। इसी संदर्भ में आगामी 20 सितंबर को रेल रोको आंदोलन प्रस्तावित है।

निशा भगत ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था—

“आदिवासी वही कहलाएगा, जो आदिवासी परिवार में जन्म लेगा और आदिवासी रीति-रिवाजों का पालन करेगा। सरकार किसी को भी आदिवासी मान्यता दे दे, तो वह आदिवासी नहीं बन जाएगा। कुर्मी समाज आदिवासियों का हक छीनना चाहता है और हमारे आरक्षण का फायदा उठाना चाहता है।”

उनके इस बयान पर JLKM ने कड़ी आपत्ति जताई और अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें छह साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया।

JLKM सिर्फ महतो समाज की पार्टी” – निशा भगत

निष्कासन के बाद निशा भगत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा—”मेरे द्वारा दिए गए बयान के आधार पर मुझे पार्टी से निकाला गया। इससे साफ हो गया कि JLKM वास्तव में एक जाति विशेष की पार्टी है। मैंने जो बयान दिया था, वह कुर्मी समाज को लेकर था। अगर उसी को आधार बनाकर मुझे निकाला गया है तो इसका मतलब है कि पार्टी पूरी तरह जातिवादी मानसिकता से चल रही है।”

निशा भगत ने यह भी आरोप लगाया कि JLKM में महतो समाज के अलावा किसी अन्य जाति के नेताओं को महत्व नहीं दिया जाता। खासकर आदिवासी समाज को पार्टी महज़ इस्तेमाल का साधन मानती है।

“मेरी आवाज़ को कोई दबा नहीं सकता”

अपनी लड़ाई जारी रखने का ऐलान करते हुए निशा भगत ने कहा—

“मैं पहले की तरह अपनी आवाज़ बुलंद करती रहूंगी। जब तक मेरी हत्या नहीं हो जाती, मेरी आवाज़ को कोई बंद नहीं कर सकता।”

राजनीतिक समीकरण पर असर

निशा भगत के निष्कासन के बाद JLKM की राजनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं। खासकर गुमला और आसपास के क्षेत्रों में जहां आदिवासी समाज का बड़ा आधार है, वहां यह घटनाक्रम पार्टी की छवि पर असर डाल सकता है। वहीं, निशा भगत अब आगे किस राजनीतिक रास्ते पर चलेंगी, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

यह मामला न केवल JLKM की आंतरिक राजनीति को उजागर करता है, बल्कि झारखंड में जातीय और सामाजिक समीकरणों के नए विवाद को भी हवा देता दिख रहा है।

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