Ranchi: राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) परिसर में स्थापित रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी (RIMS Ranchi) को झारखंड में उन्नत नेत्र चिकित्सा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाया गया था, लेकिन वर्तमान में यह संस्थान फैकल्टी की गंभीर कमी से जूझ रहा है। डॉक्टरों की कमी के कारण यहां इलाज और शैक्षणिक गतिविधियों दोनों पर असर पड़ रहा है।
11 साल बाद तैयार हुआ आधुनिक भवन
इस संस्थान का भवन निर्माण वर्ष 2014 में शुरू हुआ था और लंबी देरी के बाद 2025 में पूरा हुआ। करीब 85 करोड़ रुपये की लागत से बने इस भवन पर अन्य खर्चों को मिलाकर कुल लागत 100 करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। जनवरी 2026 से नेत्र रोग विभाग को मुख्य भवन से यहां शिफ्ट कर दिया गया है।
नई इमारत में कॉर्निया ट्रांसप्लांट, रेटिना सर्जरी और Glaucoma (काला मोतियाबिंद) जैसे उन्नत इलाज की सुविधाएं उपलब्ध हैं। संस्थान के प्रमुख प्रो. डॉ. सुनील कुमार के अनुसार, यहां रोजाना ओपीडी में 200 से अधिक मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं और संख्या लगातार बढ़ रही है।

जरूरत 18 फैकल्टी की, मौजूद केवल 3
संस्थान को उच्च स्तरीय नेत्र चिकित्सा केंद्र बनाने का लक्ष्य था, लेकिन फैकल्टी की कमी बड़ी चुनौती बन गई है।
4 प्रोफेसर की जरूरत — मौजूद 1
6 एडिशनल प्रोफेसर की जरूरत — मौजूद 1
8 एसोसिएट प्रोफेसर की जरूरत — मौजूद 1
यानी कुल 18 फैकल्टी पदों के मुकाबले सिर्फ 3 डॉक्टरों के भरोसे पूरा संस्थान चल रहा है।
इसके अलावा, अस्पताल में कम से कम 10 सीनियर रेजिडेंट होने चाहिए, लेकिन वर्तमान में केवल 4 सीनियर रेजिडेंट ही काम कर रहे हैं।
पीजी सीटों की मान्यता पर भी खतरा
फैकल्टी की कमी का असर मेडिकल शिक्षा पर भी पड़ सकता है। विभाग में पोस्ट ग्रेजुएट (PG) की 8 सीटें हैं, लेकिन यदि National Medical Commission की जांच में फैकल्टी की कमी पाई जाती है, तो इन सीटों की मान्यता पर संकट आ सकता है।
भर्ती प्रक्रिया जारी, पर मरीज प्रभावित
संस्थान प्रमुख डॉ. सुनील कुमार का कहना है कि डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया चल रही है। नए विशेषज्ञों की नियुक्ति से इलाज की गुणवत्ता में सुधार होगा और कई नई सेवाएं भी शुरू की जा सकेंगी।
हालांकि, फिलहाल फैकल्टी की कमी के कारण राज्य के सबसे बड़े सरकारी नेत्र संस्थान में मरीजों को समय पर बेहतर इलाज मिलने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द नियुक्तियां नहीं हुईं, तो संस्थान की क्षमता का पूरा लाभ जनता तक नहीं पहुंच पाएगा।



