Ranchi: झारखंड में 23 फरवरी को होने वाले नगरपालिका चुनाव इस बार राजनीतिक तौर पर बेहद दिलचस्प हो गए हैं। पांच साल बाद हो रहे इन चुनावों के नतीजे 27 फरवरी को घोषित किए जाएंगे। चुनाव भले ही गैर-दलीय आधार पर हो रहे हों, लेकिन राज्य के 48 शहरी स्थानीय निकायों में मुकाबला अब त्रिकोणीय रूप ले चुका है।
सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन के दो प्रमुख दल—झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस—संयुक्त उम्मीदवार पर सहमति नहीं बना सके। इसके बाद दोनों दलों ने नौ नगर निगमों में महापौर पद और 20 नगर परिषदों व 19 नगर पंचायतों में अध्यक्ष पद के लिए अलग-अलग उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा कर दी। 8 फरवरी 2026 को नाम वापसी की अंतिम तिथि के बाद तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई।
हालांकि बीजेपी भी पूरी तैयारी के साथ मैदान में है। शहरी क्षेत्रों में मजबूत मानी जाने वाली भाजपा को नगर निगम चुनावों में अपने सहयोगी दलों—एजेएसयू पार्टी, जद(यू) और लोजपा (रामविलास)—से खास चुनौती नहीं मिल रही है। ऐसे में रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो, देवघर, हजारीबाग, गिरिडीह और मेदिनीनगर जैसे प्रमुख शहरों में मुकाबला रोचक हो गया है।
गैर-दलीय चुनाव, लेकिन सियासी रंग गहरा
कांग्रेस प्रवक्ता सोनल शांति ने कहा कि यह विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं हैं, बल्कि स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाने वाले चुनाव हैं। उनके अनुसार, चूंकि चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं हो रहे हैं, इसलिए इसे गठबंधन में मतभेद के रूप में देखना सही नहीं है।
जेएमएम प्रवक्ता मनोज पांडे ने भी कहा कि नगर निकाय चुनावों में स्थानीय समीकरण और उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ ज्यादा अहम होती है। उन्होंने बताया कि पार्टी ने उन्हीं उम्मीदवारों को समर्थन दिया है जो पहले से मैदान में सक्रिय थे या हाल ही में पार्टी से जुड़े हैं।
शहरी विस्तार की रणनीति?
राजनीतिक जानकारों और दलों के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि जेएमएम नेतृत्व शहरी क्षेत्रों में अपना आधार मजबूत करने के लिए यह रणनीति अपना रहा है। परंपरागत रूप से जेएमएम ग्रामीण इलाकों में मजबूत रही है, जबकि शहरी क्षेत्रों में भाजपा और कांग्रेस का प्रभाव रहा है।
81 सदस्यीय विधानसभा में जेएमएम की 34 सीटों में से अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों से हैं। लगातार छह वर्षों से सत्ता में रहने के बाद पार्टी अब बड़े शहरों में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि कुछ स्थानों पर अन्य दलों के बागी नेताओं को भी समर्थन दिया गया है।
उदाहरण के तौर पर, धनबाद के पूर्व महापौर चंद्रशेखर अग्रवाल, जो पहले भाजपा से जुड़े थे, अब जेएमएम समर्थित उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। भाजपा द्वारा किसी अन्य नेता को समर्थन दिए जाने के बाद उन्होंने पाला बदला।
गठबंधन पर असर?
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि गैर-दलीय आधार पर चुनाव कराने के पीछे एक वजह यह भी हो सकती है कि जेएमएम शहरी क्षेत्रों में अपनी ताकत आजमाना चाहती है। हालांकि दोनों दल सार्वजनिक रूप से गठबंधन में किसी दरार से इनकार कर रहे हैं।
दिलचस्प यह भी है कि कई शहरी निकायों में एक ही दल से जुड़े एक से अधिक उम्मीदवार मैदान में हैं। पार्टी नेतृत्व ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी भी दी है, लेकिन इससे स्पष्ट है कि स्थानीय स्तर पर समीकरण काफी जटिल हैं।
कुल मिलाकर, गैर-दलीय चुनाव होने के बावजूद झारखंड का निकाय चुनाव इस बार राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है। अब नजर 23 फरवरी की वोटिंग और 27 फरवरी के नतीजों पर टिकी है, जो राज्य की शहरी राजनीति की नई दिशा तय कर सकते हैं।



