Khunti: झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र—विशेषकर रांची, खूंटी, गुमला और पश्चिम सिंहभूम—में आदिवासी समाज ने सदियों पहले एक ऐसी भूमि व्यवस्था विकसित की, जो आज भी उनकी पहचान और अस्मिता का आधार है। अक्सर इन दिनों “भुईहरी” और “मुंडारी खूंटकट्टी” शब्द चर्चा में रहते हैं। आखिर क्या है ये? आइए जानते हैं।
जंगल काटकर बसाया गया गांव
इतिहास बताता है कि जब मुंडा और ओरांव जैसे आदिवासी समुदाय छोटानागपुर क्षेत्र में बसे, तब यहां घने जंगल थे। उन्होंने सामूहिक श्रम से जंगल काटकर जमीन को खेती योग्य बनाया और गांव बसाए। इसी प्रक्रिया से दो प्रमुख भूमि व्यवस्थाओं का जन्म हुआ—मुंडारी खूंटकट्टी और भुईहरी।
क्या है मुंडारी खूंटकट्टी?
मुंडारी खूंटकट्टी मुख्य रूप से मुंडा जनजाति की पारंपरिक भूमि व्यवस्था है।
‘खूंट’ का अर्थ है कबीला या गोत्र (किल्ली) और ‘कट्टी’ का अर्थ है जंगल काटना। यानी जिस जमीन को किसी कबीले ने सबसे पहले जंगल साफ कर बसाया, उस पर पूरे कबीले का सामूहिक अधिकार माना गया।
इस व्यवस्था में—
जमीन किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे कबीले की साझा संपत्ति होती है।
मूल बसने वाले परिवारों और उनके वंशजों को ही अधिकार मिलता है।
जमीन को बाहरी लोगों को बेचना या हस्तांतरित करना प्रतिबंधित है।
गांव की पारंपरिक संस्थाएं—मुंडा, मानकी और पड़हा राजा—सामाजिक व भूमि विवादों का समाधान करती हैं।
खूंटी जिला इस व्यवस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। बिरसा मुंडा के उलगुलान का एक बड़ा कारण भी पारंपरिक भूमि अधिकारों की रक्षा था।
क्या है भुईहरी व्यवस्था?
भुईहरी व्यवस्था मुख्य रूप से ओरांव (उरांव) समुदाय से जुड़ी है।
‘भुई’ का अर्थ भूमि और ‘हरी’ का अर्थ मूल निवासी या मालिक होता है। यानी जो लोग सबसे पहले भूमि को साफ कर खेती योग्य बनाते हैं, उन्हें भुईहरी माना जाता है।
इस व्यवस्था में भी—
जमीन सामुदायिक स्वामित्व में रहती है।
गांव के लोग मिलकर खेती और संरक्षण करते हैं।
बाहरी लोगों को जमीन हस्तांतरित करने पर रोक होती है।
कई विद्वान भुईहरी और खूंटकट्टी को समान प्रकृति की व्यवस्था मानते हैं, अंतर केवल संबंधित जनजाति का है—मुंडा में खूंटकट्टी और ओरांव में भुईहरी।
कानूनी मान्यता और संरक्षण
ब्रिटिश काल में जमींदारों और महाजनों द्वारा जमीन हड़पने की घटनाएं बढ़ीं, जिससे आदिवासी विद्रोह हुए। इसके बाद 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) लागू किया गया। इस कानून में खूंटकट्टी और भुईहरी जमीन को विशेष दर्जा और सुरक्षा दी गई। बिना प्रशासनिक अनुमति इन जमीनों का हस्तांतरण गैर-आदिवासियों को नहीं किया जा सकता।
आज क्यों है चर्चा में?
औद्योगिकीकरण, खनन परियोजनाओं, भूमि बैंक और शहरी विस्तार के कारण इन पारंपरिक व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा है। कई क्षेत्रों में भूमि विवाद और अधिकारों को लेकर संघर्ष जारी है। ऐसे में भुईहरी और मुंडारी खूंटकट्टी को समझना और उनके ऐतिहासिक महत्व को जानना जरूरी हो गया है।
दरअसल, ये सिर्फ जमीन की व्यवस्था नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, स्वशासन और सामूहिक जीवन पद्धति का आधार हैं। छोटानागपुर की यह परंपरा आज भी झारखंड की पहचान और विरासत का अभिन्न हिस्सा है।



