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हो समाज महासभा का बड़ा फैसला: महिलाओं को पैतृक संपत्ति में जन्मजात अधिकार नहीं, अंतर्जातीय विवाह और रिंग सेरेमनी पर भी रोक

Chaibasa : आदिवासी हो समाज महासभा के दो दिवसीय वार्षिक अधिवेशन–2026 में समाज से जुड़े कई अहम और दूरगामी निर्णय लिए गए हैं। किरीबुरु स्थित आदिवासी कल्याण केंद्र में आयोजित इस अधिवेशन के दूसरे दिन प्रतिनिधि सभा में महिलाओं के पैतृक संपत्ति अधिकार, विवाह परंपराओं और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को लेकर महत्वपूर्ण फैसले सर्वसम्मति से पारित किए गए।

महिलाओं को पैतृक संपत्ति में जन्मजात अधिकार नहीं

प्रतिनिधि सभा में यह निर्णय लिया गया कि हो समाज में महिलाओं को पैतृक संपत्ति में जन्मजात अधिकार नहीं मिलेगा। हालांकि, परंपरा से चले आ रहे परिस्थितिजन्य अधिकार पहले की तरह मान्य रहेंगे
सभा में वक्ताओं ने कहा कि हो समाज की सामाजिक संरचना परंपराओं और रीति-रिवाजों पर आधारित रही है और संपत्ति के अधिकार भी इसी व्यवस्था के अनुरूप तय किए जाते हैं। समाज का मानना है कि इस फैसले से पारंपरिक सामाजिक संतुलन बना रहेगा।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि महिलाओं की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। परिवार, संस्कृति और सामाजिक जीवन में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए शिक्षा, संस्कार और सामाजिक भागीदारी को और मजबूत करने पर जोर दिया गया।

भाग कर विवाह को लेकर सख्त नियम

प्रतिनिधि सभा में ‘केया–केपेया आंदी’ यानी भाग कर विवाह की परंपरा पर भी विस्तार से चर्चा हुई। यह तय किया गया कि बाला की प्रक्रिया के दौरान लड़का-लड़की के घर जाकर विवाह कर देने की वर्तमान प्रवृत्ति हो समाज की परंपरा के खिलाफ है और इसे अमान्य माना जाएगा।

हालांकि, भाग कर विवाह की प्रथा को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है। इसके लिए यह अनिवार्य किया गया कि: घर के आंगन में ससंग–सुनुम और आदिंग–हेबे आदेर की प्रक्रिया पूरी हो लड़की पक्ष के लोग अजिहनर के रूप में लड़के के घर आएं, इसी के बाद बाला को संपन्न माना जाएगा।

अंतर्जातीय विवाह और रिंग सेरेमनी पर रोक

महासभा ने यह भी निर्णय लिया कि अंतर्जातीय विवाह को हो समाज में मान्यता नहीं दी जाएगी। ऐसे विवाहों को किसी भी पारंपरिक पूजा-पाठ या घर के आदिंग में स्थान नहीं मिलेगा। इसके अलावा रिंग सेरेमनी को भी हो समाज की विवाह परंपरा के विरुद्ध मानते हुए इस पर पूरी तरह रोक लगाने का फैसला लिया गया।

मारंग बोंगा परंपरा को बचाने की पहल

अधिवेशन में मारंग बोंगा परंपरा को लेकर गंभीर चिंता जताई गई। महासभा ने सभी किलियों (गोत्रों) से अपने-अपने मारंग बोंगा से जुड़े पूजा-पाठ और विधानों का दस्तावेजीकरण कर महासभा को सौंपने का आह्वान किया।

महासभा के अध्यक्ष मुकेश बिरुवा ने बिरुवा किली के मारंग बोंगा का विस्तृत इतिहास साझा करते हुए कहा कि यह केवल पूजा नहीं, बल्कि किली के प्रवास और अस्तित्व का जीवंत इतिहास है, जिसे सहेजना अत्यंत आवश्यक है।

बड़ी संख्या में प्रतिनिधियों की मौजूदगी

प्रतिनिधि सभा में सोमा कोड़ा, चैतन्य कुंकल, बामिया बारी, छोटेलाल तामसोय, माधव चंद्र कोड़ा, रोया राम चंपिया, गोपी लागुरी, रमेश लागुरी, बलभद्र बिरुली, श्याम बिरुवा, अमर बिरुवा, जयराम पाट पिंगुवा, भूषण लागुरी, नीलिमा पुरती, गीता लागुरी, पदमुनि लागुरी सहित बड़ी संख्या में समाज के प्रतिनिधि शामिल हुए। महासभा के ये फैसले आने वाले समय में हो समाज के भीतर व्यापक बहस और विमर्श का विषय बने रहेंगे।

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