Ranchi : आदिवासी अस्मिता के प्रखर प्रतीक, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन की जयंती पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भावुक श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने पिता को केवल एक महान जननेता नहीं, बल्कि अपना जीवन-मार्गदर्शक और संघर्ष की मिसाल बताया। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर अपने पिता के साथ ली गई तस्वीरें साझा करते हुए उनके साथ जुड़ी स्मृतियों को याद किया।
भावुक संदेश में झलकी बेटे की भावना
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि उन्होंने बाबा को कई बार थका हुआ देखा, लेकिन कभी टूटा हुआ नहीं देखा। यही अटूट इच्छाशक्ति आज भी उनके भीतर जीवित है। उन्होंने दो टूक कहा कि सत्ता उनके लिए कभी लक्ष्य नहीं रही, बल्कि जनसेवा का माध्यम है और वह अपने पिता के दिखाए रास्ते से कभी विचलित नहीं होंगे, चाहे चुनौतियां कितनी भी बड़ी क्यों न हों।

जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के प्रतीक
शिबू सोरेन को झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश में जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के सबसे बड़े योद्धा के रूप में जाना जाता है। 1970 के दशक में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना कर उन्होंने अलग राज्य की मांग को संगठित आंदोलन का रूप दिया। आदिवासी और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष दशकों तक चला, जिसका परिणाम वर्ष 2000 में झारखंड राज्य के गठन के रूप में सामने आया।
तीन बार मुख्यमंत्री, आठ बार सांसद
दिशोम गुरु का राजनीतिक सफर चार दशकों से अधिक का रहा। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने—2005, 2008 और 2009-10 के दौरान। गठबंधन राजनीति के कारण उनका कार्यकाल भले ही लंबा न रहा हो, लेकिन उनका प्रभाव गहरा रहा। दुमका से वे आठ बार सांसद रहे और केंद्र सरकार में तीन बार कोयला मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। संसद से लेकर सड़क तक उनकी पहचान एक निर्भीक और बेबाक आदिवासी नेता के रूप में रही।
विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि एक बेटे के रूप में उन्होंने अपने पिता से सादगी, साहस और सत्ता को जनसेवा का साधन मानने का संस्कार सीखा है। उन्होंने दोहराया कि दिशोम गुरु की अडिग इच्छाशक्ति, संघर्ष की परंपरा और आदिवासी अस्मिता की रक्षा का जो मार्ग बाबा ने दिखाया, उसी पर चलना उनके जीवन और राजनीति का मूल उद्देश्य रहेगा।



