Ranchi : झारखंड की राजनीति में एक समय प्रभावशाली मानी जाने वाली सीता सोरेन इन दिनों राजनीतिक नेपथ्य में नजर आ रही हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से अलग होकर भाजपा में शामिल होने और 2024 के चुनाव में हार का सामना करने के बाद उनकी सक्रियता में साफ गिरावट देखी जा रही है। चुनावी हलचल खत्म होते ही वे न तो पार्टी के बड़े कार्यक्रमों में दिखाई दे रही हैं और न ही राजनीतिक बहसों में उनकी मुखर भूमिका दिख रही है।
भाजपा में शामिल होने के समय सीता सोरेन को आदिवासी महिला चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाने की चर्चा थी। पार्टी को उनसे संगठनात्मक मजबूती और चुनावी लाभ की उम्मीद थी, लेकिन चुनावी नतीजे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। इसके बाद पार्टी के भीतर भी उनकी भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट संकेत सामने नहीं आए हैं।
सोशल मीडिया तक सिमटी मौजूदगी
चुनाव के दौरान जहां सीता सोरेन सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर आक्रामक नजर आती थीं, वहीं अब उनकी गतिविधियां काफी सीमित हो गई हैं। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर उनके पोस्ट अधिकतर जयंती, पुण्यतिथि या सांस्कृतिक अवसरों तक ही सीमित हैं। यह बदलाव बताता है कि वे फिलहाल सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए हुए हैं।
राजनीतिक जानकार इसे एक रणनीतिक विराम भी मान रहे हैं। चुनावी हार के बाद कई नेता संगठन के भीतर अपनी स्थिति मजबूत करने और नए अवसर की तलाश में समय लेते हैं। सीता सोरेन के मामले में भी यह स्पष्ट नहीं है कि भाजपा उन्हें संगठनात्मक भूमिका देगी या भविष्य में किसी चुनावी जिम्मेदारी के लिए तैयार करेगी।
राजनीतिक भविष्य पर सवाल
झामुमो से अलगाव के बाद सीता सोरेन का पारंपरिक राजनीतिक आधार भी कमजोर पड़ा है, जो कभी उनकी बड़ी ताकत माना जाता था। ऐसे में उनकी राजनीतिक वापसी की राह आसान नहीं दिखती। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा उन्हें कोई नई और प्रभावी भूमिका देगी, या फिर उनकी राजनीति सीमित दायरे में सिमट कर रह जाएगी।



