Khunti: सरकारें चाहे गरीबी घटने और योजनाओं की सफलता के दावे करें, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त आज भी कुछ और ही कहानी कहती है। खूंटी जिले के खूंटी प्रखंड के बिरहु पंचायत अंतर्गत रेवा गांव से एक हृदयविदारक मामला सामने आया है, जो सरकारी दावों की पोल खोलता है।
यहाँ रहने वाले लगभग 60 वर्षीय दामु मुंडा नामक शारीरिक रूप से अशक्त आदिवासी बुजुर्ग गीली ज़मीन पर बोरा बिछाकर सोने को मजबूर हैं। उनका कच्चा मकान लगातार बारिश के कारण ढह गया, जिससे अब उनके पास सिर छिपाने की भी जगह नहीं बची है।
बेटा पहले ही कर चुका है दुनिया को अलविदा
दामु मुंडा का सहारा उनका कमाऊ बेटा था, लेकिन कुछ साल पहले उसकी असमय मौत ने इस परिवार को पूरी तरह असहाय कर दिया। पत्नी और परिवार पहले ही मुश्किल हालात में जी रहे थे, ऐसे में मकान गिरने के बाद बुजुर्ग की पीड़ा और बढ़ गई है। 
योजनाओं से नहीं मिला लाभ
दामु मुंडा बताते हैं कि आज तक उन्हें किसी भी आवास योजना का लाभ नहीं मिला। “अबुआ आवास” जैसी योजनाओं की घोषणाओं और प्रचार-प्रसार के बावजूद उनके हिस्से में न तो पक्का घर आया और न ही कोई ठोस राहत। गरीब होने के कारण खुद से भी मकान बनाना संभव नहीं हुआ।
वृद्धावस्था पेंशन भी बंद
सरकार की वृद्धावस्था पेंशन योजना से दामु मुंडा जुड़े तो हैं, लेकिन विगत चार–पांच महीनों से उन्हें पेंशन की राशि भी नहीं मिल रही है। पहले यही राशि उनके लिए जीवन-यापन का सहारा हुआ करती थी। पेंशन रुकने से अब उनकी स्थिति और भी दयनीय हो गई है।
सवालों के घेरे में सरकार
यह घटना उन सरकारी दावों को कटघरे में खड़ा करती है, जिनमें गरीबी उन्मूलन और योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन का दावा किया जाता है। केंद्र सरकार जहां गरीबी में कमी के आंकड़े पेश कर रही है, वहीं राज्य सरकार “अबुआ सरकार” कहकर योजनाओं को आमजन तक पहुँचाने का दावा कर रही है। लेकिन दामु मुंडा जैसे गरीब, आदिवासी और असहाय लोग आज भी खुले आसमान और गीली ज़मीन पर रातें काटने को मजबूर हैं।
गांव के लोग बताते हैं कि इस तरह की स्थिति सिर्फ दामु मुंडा की ही नहीं, बल्कि और भी कई गरीब आदिवासी परिवारों की है जिन्हें योजनाओं का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है।



