Ranchi : झारखंड के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और जमशेदपुर पश्चिम के विधायक Saryu Roy ने सारंडा के बदलते स्वरूप और वहां बढ़ती खनन गतिविधियों को लेकर एक नई पुस्तक ‘Changing Face of Saranda’ प्रकाशित की है। लगभग 92 पृष्ठों की इस अंग्रेजी पुस्तक में सारंडा के पर्यावरण, वन संपदा और खनन से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों को तथ्यों और आंकड़ों के साथ उठाया गया है।
पुस्तक में लेखक ने सारंडा के ऐतिहासिक, भौगोलिक और पर्यावरणीय महत्व को विस्तार से बताया है। सरयू राय के अनुसार, स्थानीय ‘हो’ जनजाति की भाषा में सारंडा का अर्थ “सात सौ पहाड़ियों की भूमि” होता है। उन्होंने वर्णन किया है कि यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने साल वनों और जैव विविधता के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन अब इसका स्वरूप तेजी से बदल रहा है।
किताब में सबसे अधिक चिंता खनन गतिविधियों के विस्तार और पर्यावरणीय नियमों की कथित अनदेखी को लेकर व्यक्त की गई है। सरयू राय का कहना है कि सारंडा क्षेत्र में लौह अयस्क (आयरन ओर) के विशाल भंडार मौजूद हैं और इन्हें निकालने के लिए लगातार खनन परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। उनका आरोप है कि पर्यावरण संरक्षण की अपेक्षा खनन और औद्योगिक हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।
विधायक ने दावा किया कि वर्ष 1968 में तत्कालीन बिहार सरकार ने सारंडा के लगभग 4300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने के लिए अधिसूचना जारी की थी। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को विधानसभा में भी उठाया गया, लेकिन आज तक उस अधिसूचना का स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हो पाया है, जिससे कई सवाल खड़े होते हैं।
सरयू राय ने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद सारंडा को अभयारण्य घोषित करने की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है। उनके अनुसार, कई बड़ी इस्पात और खनन कंपनियों ने क्षेत्र में माइनिंग लीज के लिए आवेदन कर रखा है, जिसके कारण जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
उन्होंने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि प्रशासन औद्योगिक समूहों के हितों को अधिक महत्व दे रहा है, जबकि पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की चिंताओं को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल रही है। उनका मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो सारंडा की पहचान और पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
सरयू राय ने कहा कि यह पुस्तक केवल एक शुरुआत है और सारंडा से जुड़े विषयों पर आगे और व्यापक अध्ययन तथा दस्तावेजीकरण किया जाएगा। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज का सारंडा पहले जैसा नहीं रहा और यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां इसके मूल स्वरूप को केवल पुस्तकों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।


