Khunti: खूंटी-तमाड़ मुख्य सड़क से करीब एक किलोमीटर अंदर, पहाड़ों के बीच बसा मुरहू प्रखंड के कूड़ापूर्ति पंचायत का आड़ा गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जूझ रहा है। करीब 140–150 घरों और लगभग 1500 की आबादी वाला यह गांव विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ नजर आता है। 
गांव के ग्रामीण मानसिंह पाहन बताते हैं कि आड़ा में आज तक बिजली नहीं पहुंच पाई है। आधुनिक युग में जहां शहरों में 24 घंटे बिजली उपलब्ध है, वहीं इस गांव के लोग आज भी ढिबरी और लालटेन के सहारे जीवन यापन करने को मजबूर हैं। मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए ग्रामीणों ने अपने स्तर पर सोलर प्लेट खरीदे हैं, लेकिन वह भी पर्याप्त नहीं है।
अतुल्य प्रेम हस्सापूर्ति के अनुसार, गांव तक पहुंचने का रास्ता भी बेहद खतरनाक है। सड़क निर्माण अधूरा है—कहीं कच्ची सड़क है तो कहीं कुछ दूरी तक पीसीसी ढलाई की गई है। सड़क में तीखे मोड़, ऊंचे-नीचे ढलान और खाई जैसे हालात हैं, जिससे हर समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है इस मार्ग पर कई बार बाइक, ट्रैक्टर यहां तक कि पुलिस वाहन भी दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। बरसात के दिनों में स्थिति और भयावह हो जाती है, जब रास्ता पूरी तरह फिसलन भरा और जानलेवा बन जाता है। 
हालांकि गांव में एक आंगनबाड़ी केंद्र और एक प्राथमिक विद्यालय है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं के अभाव में इनका संचालन भी प्रभावित होता है। बच्चों और गर्भवती महिलाओं को यहां पहुंचने में भी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
स्थिति और भी चिंताजनक तब हो जाती है जब गांव के पास स्थित आयुष्मान आरोग्य मंदिर, आड़ा की हालत पर नजर डाली जाए। मुख्य सड़क किनारे बने इस स्वास्थ्य केंद्र में भी बिजली की कोई व्यवस्था नहीं है। न तो यहां सोलर सिस्टम है और न ही बैटरी की सुविधा। इसके कारण मरीजों को गर्मी में इलाज कराना पड़ता है, वहीं स्वास्थ्यकर्मियों को भी इस भीषण गर्मी में भारी परेशानियों के बीच अपनी सेवाएं देनी पड़ रही हैं। 
कोंता मुंडा ने बताया कि गांव में करीब 140 से 150 घर हैं, जिनकी कुल आबादी लगभग 1500 है। बिजली नहीं होने के कारण ग्रामीण आज भी ढिबरी और लालटेन के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए लोगों ने अपने स्तर पर सोलर प्लेट खरीदे हैं, जिससे किसी तरह काम चलाया जा रहा है।

आगे उन्होंने बताया कि ग्राम सभा के माध्यम से कई बार जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को आवेदन देकर बिजली और पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की गई, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है। गांव में एक सोलर वाटर प्लांट जरूर स्थापित है, लेकिन वह भी नियमित रूप से काम नहीं करता। कभी-कभार ही कुछ लोगों को पानी मिल पाता है। इसके अलावा गांव में लगे चापानल भी पूरी तरह कार्यरत नहीं हैं—कुछ खराब पड़े हैं, तो कुछ ही चालू हालत में हैं। मजबूरी में ग्रामीणों को चुआं और डाड़ी जैसे पारंपरिक जल स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।



