Ranchi: असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों में जहां हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की, वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने भी सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर राजनीतिक हलकों में चर्चा बटोरी है। भले ही पार्टी को कोई सीट नहीं मिली, लेकिन उसके प्रदर्शन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जेएमएम ने इस चुनाव में 16 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से दो सीटों पर पार्टी दूसरे स्थान पर रही, जबकि 11 सीटों पर तीसरे स्थान पर पहुंचकर उसने अपनी पकड़ का संकेत दिया। खासतौर पर चाय बागान क्षेत्रों में पार्टी को अपेक्षाकृत अच्छा समर्थन मिला, जो भविष्य की रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इन नतीजों पर संतोष जताया है। उन्होंने जनता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सीमित समय और संसाधनों के बावजूद जो समर्थन मिला, वह उत्साह बढ़ाने वाला है। उन्होंने इसे आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकार और पहचान की लड़ाई से भी जोड़ा।

चुनाव प्रचार के दौरान हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने करीब 10 दिनों तक असम में कैंप किया और उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार किया। इस दौरान उन्होंने आदिवासी समुदाय को एसटी का दर्जा, चाय बागान मजदूरों की स्थिति और जमीन के अधिकार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
जेएमएम का मानना है कि बिना किसी बड़े गठबंधन के चुनाव लड़कर उसने एक मजबूत आधार तैयार किया है। सात सीटों पर 15 हजार से अधिक वोट मिलना इस बात का संकेत है कि पार्टी धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, खासकर झारखंडी मूल के मतदाताओं के बीच।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में जेएमएम का प्रदर्शन कांग्रेस के लिए चेतावनी साबित हो सकता है। पार्टी भले ही सीटें न जीत पाई हो, लेकिन उसने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई है, जिससे भविष्य में विपक्षी राजनीति की दिशा बदल सकती है।
कुल मिलाकर, असम चुनाव 2026 जेएमएम के लिए केवल सीटों की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह उसके राष्ट्रीय विस्तार और सामाजिक मुद्दों को व्यापक स्तर पर उठाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हुआ है। आने वाले समय में यह प्रदर्शन पूर्वोत्तर और अन्य राज्यों में पार्टी की रणनीति को और मजबूत कर सकता है।


