Khunti: खूंटी जिले के अड़की प्रखंड अंतर्गत हूंट में संचालित कल्याण विभाग के राजकीय अनुसूचित जनजातीय आवासीय उत्क्रमित उच्च विद्यालय से सामने आई तस्वीरें और जानकारी न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता को भी उजागर करती हैं। यह वही विद्यालय है जहां गरीब, मजदूर और दूर-दराज के आदिवासी परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद के साथ भेजते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि यहां बच्चों का भविष्य संवारने के बजाय उनके जीवन को खतरे में डाल दिया गया है। 
जानकारी के अनुसार विद्यालय में रह रहे छोटे-छोटे बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक सही तरीके से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। बच्चों को न तो निर्धारित मेन्यू के अनुसार पौष्टिक भोजन मिल रहा है और न हीं शुद्ध पेयजल एवं स्नान की समुचित व्यवस्था है। सबसे दर्दनाक और शर्मनाक तस्वीर तब सामने आई जब विद्यालय के मासूम बच्चे नदी के बीच बने गड्ढे में जमा गंदे पानी में स्नान करते नजर आए। 
बताया जा रहा है कि विद्यालय परिसर में स्नान और पर्याप्त पानी की व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चों को प्रतिदिन लगभग एक किलोमीटर दूर नदी तक जाना पड़ता है। वहां पहुंचने के लिए बच्चों को खूंटी-तमाड़ मुख्य सड़क पार करनी पड़ती है, जो एक व्यस्त हाइवे है। इस सड़क पर दिनभर भारी वाहनों की आवाजाही होती रहती है। ऐसे में कभी भी कोई बड़ा सड़क हादसा हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इतने छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर विद्यालय प्रबंधन की ओर से कोई ठोस व्यवस्था दिखाई नहीं देती। 
नदी तक पहुंचने का रास्ता भी बेहद खतरनाक बताया जा रहा है। बच्चों को झाड़ियों, फिसलन भरी चट्टानों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। जिस स्थान पर बच्चे स्नान करते हैं वहां साफ बहता पानी नहीं, बल्कि नदी के बीच गड्ढे में जमा गंदा पानी है। ऐसे पानी में स्नान करने से बच्चों में त्वचा रोग, संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बना हुआ है। 
इतना ही नहीं, जिस इलाके में बच्चे स्नान करने जाते हैं वहां जंगली हाथियों की आवाजाही भी अक्सर होती रहती है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार आसपास के जंगलों में अन्य जंगली जानवर भी देखे जाते हैं। ऐसे में छोटे-छोटे बच्चों का बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के इस तरह नदी तक जाना कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकता है। पानी में डूबने, चट्टानों से फिसलने या जंगली जानवरों के हमले का खतरा हर समय बना रहता है। 
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार और संबंधित विभाग की निगरानी व्यवस्था कहां है? आदिवासी आवासीय विद्यालयों की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवारों के बच्चे सुरक्षित वातावरण में रहकर शिक्षा प्राप्त कर सकें। सरकार हर वर्ष इन विद्यालयों के संचालन पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद भयावह नजर आ रही है।
माता-पिता अपने बच्चों को इस उम्मीद से विद्यालय भेजते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर बेहतर भविष्य बनाएंगे, लेकिन यहां तो बच्चों की मूलभूत जरूरतें तक पूरी नहीं हो पा रही हैं। यदि किसी दिन कोई बड़ा हादसा हो जाए और किसी बच्चे की जान चली जाए, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या तब प्रशासन और विभाग की नींद खुलेगी? 
स्थानीय लोगों का कहना है कि विद्यालय की व्यवस्था में तत्काल सुधार की जरूरत है। बच्चों के लिए सुरक्षित स्नानघर, शुद्ध पेयजल, पौष्टिक भोजन और सुरक्षा की उचित व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मियों पर कार्रवाई की मांग भी उठने लगी है। 
हूंट आवासीय विद्यालय की यह तस्वीर केवल एक विद्यालय की बदहाली नहीं, बल्कि उन गरीब आदिवासी परिवारों की उम्मीदों पर चोट है जो शिक्षा को अपने बच्चों के बेहतर भविष्य का एकमात्र सहारा मानते हैं।



