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जेटेट भाषा विवाद पर सियासत तेज, कमेटी गठन को लेकर उठे सवाल; समाधान या राजनीतिक रणनीति?

Ranchi: झारखंड में शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) 2026 की नई नियमावली में भोजपुरी, मगही, अंगिका सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं को सूची से बाहर किए जाने के बाद विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इस मुद्दे को लेकर छात्रों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच बहस तेज हो गई है। बढ़ते विरोध के बीच हेमंत सोरेन सरकार ने समाधान के लिए पांच मंत्रियों की एक उच्चस्तरीय कमेटी गठित की है, जिसकी अध्यक्षता वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर कर रहे हैं। अब इस कमेटी की रिपोर्ट पर सबकी नजर टिकी हुई है।

सरकार के इस फैसले को लेकर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अविनेश कुमार सिंह ने इसे “आई वाश” और “सरकारी ड्रामेबाजी” करार दिया है। उनका कहना है कि कमेटी की रिपोर्ट आने तक जेटेट परीक्षा और उसका रिजल्ट भी आ जाएगा, ऐसे में प्रभावित छात्रों को तत्काल कोई राहत मिलने की संभावना नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि झामुमो, कांग्रेस और राजद युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और यह केवल राजनीतिक दबाव को शांत करने की कोशिश है।

वहीं कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने कहा कि किसी भी क्षेत्रीय भाषा को संरक्षण देना सरकार की जिम्मेदारी होती है। उन्होंने मांग की कि कमेटी जल्द निर्णय ले ताकि भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं से जुड़े छात्रों को नुकसान न हो। प्रदीप यादव ने विशेष रूप से संताल क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां संथाली के बाद सबसे अधिक अंगिका बोली जाती है और बड़ी संख्या में छात्र इससे प्रभावित हो सकते हैं।

दूसरी ओर, झामुमो ने सरकार के कदम का बचाव किया है। पार्टी के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने कहा कि सरकार युवाओं को रोजगार देने के लिए प्रतिबद्ध है और भाषा विवाद के कारण परीक्षा प्रक्रिया प्रभावित न हो, इसलिए परीक्षा कराने के साथ-साथ विवाद के समाधान हेतु कमेटी बनाई गई है। उन्होंने कहा कि जब कैबिनेट के भीतर किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तब संवेदनशील तरीके से समाधान निकालना सरकार की जिम्मेदारी होती है। उनके अनुसार विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहा है।

इस पूरे विवाद पर वरिष्ठ पत्रकार बैद्यनाथ मिश्र ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे “साजिश” बताते हुए कहा कि जब परीक्षा का पूरा शेड्यूल पहले ही जारी हो चुका है, तब कमेटी गठन का क्या औचित्य है? उनके अनुसार भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाएं पहले जेटेट में शामिल थीं, तो अचानक उन्हें हटाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। उन्होंने आरोप लगाया कि यह फैसला खास क्षेत्रों के युवाओं को शिक्षक बनने से रोकने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

बैद्यनाथ मिश्र का यह भी कहना है कि जिन इलाकों में इन भाषाओं का प्रभाव अधिक है, वहां कांग्रेस और राजद का राजनीतिक आधार मजबूत माना जाता है। ऐसे में भाषा सूची से इन्हें बाहर करने का असर राजनीतिक रूप से भी देखा जा रहा है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कमेटी में मुख्यमंत्री के करीबी मंत्रियों को शामिल किया गया है, जिससे निष्पक्ष निर्णय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उनके मुताबिक जब तक रिपोर्ट आएगी, तब तक परीक्षा प्रक्रिया पूरी हो चुकी होगी और प्रभावित छात्रों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाएगा।

फिलहाल जेटेट भाषा विवाद केवल शैक्षणिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक, सामाजिक और क्षेत्रीय पहचान से जुड़ा बड़ा प्रश्न बनता जा रहा है। छात्र संगठनों और भाषा प्रेमियों की मांग है कि क्षेत्रीय भाषाओं को उचित सम्मान और अवसर मिले। अब देखना होगा कि सरकार की बनाई कमेटी इस विवाद का व्यावहारिक समाधान निकाल पाती है या यह मामला आगे और राजनीतिक टकराव का कारण बनेगा।

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