Ranchi: झारखंड की राजनीति में इन दिनों सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर खामोश खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। Jharkhand Mukti Morcha (झामुमो) और Indian National Congress (कांग्रेस) के बीच रिश्तों में दूरी के संकेत मिल रहे हैं, जबकि दोनों दल राज्य में साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं। इस स्थिति को लेकर विपक्षी Bharatiya Janata Party (बीजेपी) लगातार कांग्रेस पर निशाना साध रही है।
बीजेपी नेताओं का आरोप है कि मुख्यमंत्री Hemant Soren की “शतरंजी चाल” के सामने कांग्रेस पूरी तरह बेबस नजर आ रही है। पार्टी के प्रदेश सह मीडिया प्रभारी योगेंद्र प्रताप सिंह ने तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक समझौता कर सकती है, भले ही उसे राजनीतिक रूप से नुकसान क्यों न उठाना पड़े।
बीजेपी ने खास तौर पर इस बात को मुद्दा बनाया है कि झामुमो ने पहले असम में और अब पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से अलग रुख अपनाते हुए चुनावी गतिविधियों में हिस्सा लिया। नेताओं का कहना है कि बंगाल में Mamata Banerjee और All India Trinamool Congress (टीएमसी) के समर्थन में प्रचार करना यह दिखाता है कि गठबंधन की सीमाएं स्पष्ट नहीं हैं।
वहीं कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा दिखाई दे रही है। प्रदेश अध्यक्ष Keshav Mahato Kamlesh ने कहा कि हेमंत सोरेन के फैसलों की जानकारी पार्टी आलाकमान को है और इस पर अंतिम टिप्पणी उन्हीं से ली जानी चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि झामुमो शायद गठबंधन को केवल झारखंड तक सीमित मानता है।
कांग्रेस के प्रदेश महासचिव Rakesh Sinha ने हालांकि यह दावा किया कि महागठबंधन में सब कुछ सामान्य है। उन्होंने इसे एक परिवार की तरह बताते हुए कहा कि जैसे एक घर का सदस्य दूसरे राज्य में काम करने जाता है, वैसे ही झामुमो अन्य राज्यों में अपनी राजनीतिक गतिविधियां चला रहा है। उनके अनुसार बीजेपी ही मुख्य विरोधी है और सभी समान विचारधारा वाले दल एकजुट हैं।
दूसरी ओर झामुमो ने भी अपने रुख को साफ करते हुए कहा कि कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन केवल झारखंड की राजनीति तक सीमित है। पार्टी के केंद्रीय महासचिव Supriyo Bhattacharya ने कहा कि राज्यसभा चुनाव जैसे मुद्दों पर फैसला पार्टी नेतृत्व और कांग्रेस आलाकमान के बीच बातचीत से तय होगा, जिससे संकेत मिलता है कि आगे दबाव की राजनीति भी देखने को मिल सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक Madhukar इस पूरे घटनाक्रम को हेमंत सोरेन की सोची-समझी रणनीति मानते हैं। उनके अनुसार बंगाल में टीएमसी के साथ खड़े होकर झामुमो राज्य के बांग्लाभाषी मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रहा है, जो संथाल, कोल्हान और दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्रों में प्रभावशाली संख्या में हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल इस खींचतान का झारखंड सरकार पर कोई तात्कालिक खतरा नहीं है, लेकिन आने वाले राज्यसभा चुनाव और भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों में यह समीकरण अहम भूमिका निभा सकता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि हेमंत सोरेन की यह “शतरंजी चाल” आगे चलकर किसे फायदा पहुंचाती है और किसे नुकसान।


