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झारखंड शराब घोटाला: एसीबी की देरी पर सवाल उठाते हुए बाबूलाल मरांडी की CBI जांच की मांग, जेएमएम ने किया पलटवार

Ranchi: झारखंड में बहुचर्चित शराब घोटाले (लगभग 750 करोड़ रुपये से अधिक के प्रकरण) को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। जेल में बंद पूर्व उत्पाद सचिव विनय चौबे को एसीबी द्वारा चार्जशीट समय पर दाखिल न करने का लाभ मिला है, जिससे विपक्षी नेता बाबूलाल मरांडी ने एसीबी की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

बाबूलाल मरांडी ने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा और बहुचर्चित शराब घोटाले की चार्जशीट तत्काल दाखिल करने के लिए एसीबी एडीजी को निर्देशित करने का आग्रह किया। मरांडी का आरोप है कि एसीबी षड्यंत्र के तहत समय सीमा का उल्लंघन कर रही है और भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का प्रयास कर रही है।

बाबूलाल ने मीडिया को बताया कि राज्य में 750 करोड़ रुपये से अधिक के शराब घोटाले में एसीबी की भूमिका संदेहास्पद है। उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की जांच CBI से कराई जाए। उनका कहना है कि एसीबी ने साक्ष्यों और वैधानिक समय-सीमा के साथ जानबूझकर समझौता किया है, जिससे आरोपियों को लाभ मिला है।

मरांडी ने बताया कि यह घोटाला शुरू में 38 करोड़ रुपये का था, लेकिन जांच की परतें खुलने के बाद इसकी राशि बढ़कर 750 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। वर्ष 2022 में झारखंड की उत्पाद नीति में बदलाव कर एक सिंडिकेट को फायदा पहुँचाया गया, जिससे राज्य को भारी राजस्व हानि हुई।

विनय चौबे को 19 अगस्त 2025 को न्यायालय से डिफॉल्ट बेल मिली। इसके अगले दिन, 20 अगस्त को अन्य आरोपियों जैसे सुधीर कुमार दास, सुधीर कुमार और नीरज कुमार को भी जमानत मिली। बाबूलाल के अनुसार, यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि एसीबी ने 90 दिनों की वैधानिक समय-सीमा के भीतर आरोप-पत्र दाखिल नहीं किए।

मरांडी का कहना है कि एसीबी ने ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां दिखावे के लिए कीं, लेकिन समय पर चार्जशीट न दाखिल करने से आरोपियों को कानूनी जांच से बचने का रास्ता मिल गया। कुल 17 आरोपियों में से 14 को डिफॉल्ट बेल मिल चुकी है, जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।

इस पर सत्तारूढ़ जेएमएम ने पलटवार किया। पार्टी के केन्द्रीय प्रवक्ता मनोज पांडे ने कहा कि बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष की मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संवैधानिक संस्थाएं अपना काम कर रही हैं और बाबूलाल के पास जनता के बीच जाने के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं है। इस विवाद ने झारखंड की राजनीति में शराब घोटाले प्रकरण की संवेदनशीलता और एसीबी की भूमिका पर चल रही बहस को और तेज कर दिया है।

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