Ranchi: झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। एक सीट शिबू सोरेन के निधन के बाद खाली है, जबकि दूसरी सीट दीपक प्रकाश के कार्यकाल समाप्त होने के साथ खाली होने वाली है। ऐसे में इन दोनों सीटों पर होने वाले चुनाव ने राजनीतिक समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है।
राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए पहली प्राथमिकता के 28 वोट की आवश्यकता होती है। वर्तमान में झारखंड की छह सीटों में से दो झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास हैं, जबकि तीन सीटें भारतीय जनता पार्टी के कब्जे में हैं। आंकड़ों के लिहाज से दोनों सीटों पर सत्ताधारी गठबंधन मजबूत स्थिति में नजर आता है।
हालांकि, हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों ने समीकरण को रोचक बना दिया है। असम चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा अकेले चुनाव लड़ने और कांग्रेस से तालमेल नहीं बनने से दोनों दलों के बीच खटास की चर्चा है। इसका असर राज्यसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है।
विपक्ष की ओर से बाबूलाल मरांडी ने अभी तक पार्टी का रुख स्पष्ट नहीं किया है। उन्होंने कहा है कि चुनाव में अभी समय है और उचित समय पर निर्णय लिया जाएगा। बिहार राज्यसभा चुनाव में हुए उलटफेर की तरह झारखंड में भी सियासी खेल की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।
वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह एक सीट पर अपना उम्मीदवार उतारेगी। पार्टी के नेताओं का कहना है कि झामुमो और कांग्रेस के संबंध मजबूत हैं और मिलकर चुनाव रणनीति तय की जाएगी।
संख्या बल के आधार पर सत्ताधारी गठबंधन के पास बढ़त है। झामुमो, कांग्रेस, राजद और वाम दलों के कुल मिलाकर 56 विधायक हैं, जिससे एक सीट पर झामुमो की जीत लगभग तय मानी जा रही है। असली मुकाबला दूसरी सीट को लेकर होगा, जहां सभी दल अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं।
दूसरी सीट के लिए कांग्रेस, भाजपा और झामुमो—तीनों के पास अलग-अलग विकल्प हैं। यदि भाजपा उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। वहीं झामुमो का रुख इस चुनाव में निर्णायक साबित होगा। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि क्या गठबंधन एकजुट रहता है या सियासी खटास का फायदा विपक्ष उठा पाता है।


