Ranchi: झारखंड की क्षेत्रीय पार्टियां अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकलकर बंगाल में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी कर रही हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), आजसू पार्टी और झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) बंगाल के सीमावर्ती इलाके, खासकर जंगल महल क्षेत्र में राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटे हैं। उनका लक्ष्य पुरुलिया, बांकुड़ा और पश्चिम मेदिनीपुर जैसे जिलों में 5-10 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ना है।
जंगल महल में सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंध
बंगाल का जंगल महल क्षेत्र झारखंड से भौगोलिक और सामाजिक रूप से काफी जुड़ा हुआ है। यहां बड़ी संख्या में आदिवासी और मूलवासी समुदाय निवास करते हैं, जिनका सांस्कृतिक और भाषाई रिश्ता झारखंड से गहरा है। यही वजह है कि झारखंडी दल इस क्षेत्र को अपने विस्तार के लिए उपयुक्त मान रहे हैं।
झामुमो की रणनीति और गठबंधन की संभावना
झामुमो ने बंगाल में एंट्री को लेकर सतर्क और रणनीतिक रुख अपनाया है। पार्टी नेतृत्व संभावित तृणमूल कांग्रेस के साथ तालमेल बनाकर सीमित सीटों पर चुनाव लड़ने पर विचार कर रहा है। इससे पार्टी बिना बड़े जोखिम के संगठन विस्तार कर सकती है। पिछली विधानसभा चुनाव में भी झामुमो ने ऐसी कवायद की थी, लेकिन अंतिम समय में अध्यक्ष हेमंत सोरेन को ममता बनर्जी ने अपने पक्ष में प्रचार के लिए मना लिया था।
आजसू का चुनावी अनुभव और भाजपा से संभावित तालमेल
आजसू पार्टी पहले भी बंगाल में चुनावी प्रयोग कर चुकी है। पिछली बार उसने बाघमुंडी सीट पर उम्मीदवार उतारा था, लेकिन सफलता सीमित रही। इस बार आजसू भाजपा के संभावित तालमेल के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। चर्चा है कि भाजपा आजसू के लिए एक सीट छोड़ सकती है, ताकि गठबंधन का दायरा और प्रभाव बढ़े।
जेएलकेएम का आक्रामक विस्तार अभियान
जेएलकेएम अपने विस्तार अभियान में आक्रामक नजर आ रहा है। केंद्रीय अध्यक्ष जयराम कुमार महतो लगातार सीमावर्ती बंगाल क्षेत्रों का दौरा कर संगठन को मजबूत कर रहे हैं। पार्टी 5 से 10 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना पर काम कर रही है और स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता दे रही है।
चुनावी समीकरणों पर असर
झारखंडी दलों की सक्रियता बंगाल के पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकती है। जंगल महल क्षेत्र पहले से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। नए दलों की एंट्री से मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय बन सकता है, जिससे वोटों का बिखराव बढ़ सकता है। इसका सीधा असर बड़े दलों तृणमूल कांग्रेस और भाजपा पर पड़ेगा।
चुनौती और अवसर
हालांकि, झारखंडी दलों के लिए बंगाल की राजनीति में स्वीकार्यता आसान नहीं होगी। भाषा, स्थानीय मुद्दे और क्षेत्रीय पहचान महत्वपूर्ण हैं। बावजूद इसके, सीमावर्ती इलाकों में साझा सामाजिक-सांस्कृतिक आधार इन दलों के लिए अवसर प्रदान करता है।
झारखंडी पार्टियों की बंगाल की सियासत में सक्रियता आगामी विधानसभा चुनावों को और दिलचस्प बना सकती है। सीमाओं के पार राजनीतिक विस्तार की यह नई कहानी जंगल महल में वोटिंग के समीकरण बदल सकती है और आने वाले चुनावों की दिशा तय कर सकती है।



