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प्रकृति और परंपरा का अद्भुत संगम—झारखंड में धूमधाम से मनाया गया सरहुल पर्व, पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश

Bokaro: झारखंड के बोकारो सहित पूरे राज्य में आदिवासी समाज का प्रमुख पर्व सरहुल बड़े ही हर्षोल्लास और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया। इस दौरान शहर के विभिन्न इलाकों में श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर सरना स्थलों पर एकत्र हुए और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।

पर्व के अवसर पर लोग अपने-अपने क्षेत्रों के सरना स्थल (जाहिर स्थान) पर पहुंचे, जहां आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुसार प्रकृति की पूजा की गई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने नाच-गान और पारंपरिक ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकाला, जो बिरसा चौक तक पहुंचा। पूरे वातावरण में उल्लास और सांस्कृतिक रंग बिखरे नजर आए।

सरहुल पर्व को प्रकृति का उत्सव माना जाता है, जिसमें सखुआ (साल) के फूल और पेड़ों की पूजा की जाती है। यह पर्व धरती, जंगल और जल के प्रति आभार प्रकट करने का प्रतीक है और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।

इस अवसर पर गांव के पुजारी, जिन्हें पाहन कहा जाता है, विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। परंपरा के अनुसार, सरना स्थल पर रखे गए घड़े के पानी को देखकर आने वाले वर्ष में वर्षा की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है। यह प्राचीन परंपरा आज भी आदिवासी समाज में आस्था और विश्वास के साथ निभाई जाती है।

सरहुल केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामुदायिक एकता का प्रतीक है। इस दिन लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और सामाजिक समरसता को मजबूत करते हैं।

आदिवासी समाज सदियों से इस पर्व के माध्यम से प्रकृति के संरक्षण और उसके महत्व को उजागर करता आ रहा है। आधुनिक समय में भी सरहुल का संदेश पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद प्रासंगिक माना जा रहा है।

इस तरह बोकारो समेत पूरे झारखंड में सरहुल पर्व ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि परंपरा और प्रकृति के बीच गहरा संबंध ही इस संस्कृति की असली पहचान है।

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