Ranchi: झारखंड की आदिवासी बेटी और ट्राइबल एक्टिविस्ट निशा भगत इन दिनों आदिवासी अस्मिता की लड़ाई की प्रतीक बन गई हैं। कुड़मी समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने का विरोध करने पर उनके खिलाफ जबरदस्त हमले हुए। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंच तक, उन्हें अपशब्द कहे गए, चरित्र हनन की कोशिश हुई और यहां तक कि जान से मारने की धमकी तक दी गई। जिस JLKM पार्टी से वह जुड़ी थीं, उसने भी दबाव में आकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। 
लेकिन इन सारी चुनौतियों के बावजूद निशा भगत पीछे नहीं हटीं। उन्होंने साफ़ कहा कि आदिवासी अस्मिता और अधिकारों से कोई समझौता नहीं होगा। यही वजह है कि धीरे-धीरे उनकी आवाज़ पूरे झारखंड में गूंजने लगी।
केंद्रीय सरना समिति समेत सभी संगठन साथ आए
लंबे समय तक अकेले लड़ने के बाद अब निशा भगत को मजबूती मिल गई है। झारखंड की केंद्रीय सरना समिति समेत तमाम बड़े आदिवासी संगठन, अपने मतभेद भुलाकर, उनके साथ खड़े हो गए हैं। संगठन नेताओं का कहना है कि आज समय आ गया है जब आदिवासी समाज को एकजुट होकर बाहरी दबावों और आरक्षण की राजनीति का सामना करना होगा।
पहले भी उठाती रही हैं अहम मुद्दे
निशा भगत इससे पहले भी आदिवासी समाज से जुड़े ज्वलंत मुद्दों को उठाती रही हैं। उन्होंने कन्वर्टेड क्रिश्चियन समुदाय को मिलने वाले ST आरक्षण का पुरजोर विरोध किया था और लगातार यह मांग की थी कि असली आदिवासियों का हक किसी और को न मिले।
निशा का एलान – “जो हक मारेगा, हिसाब सबका होगा”
केंद्रीय सरना समिति का समर्थन मिलने के बाद निशा भगत ने और सख्त तेवर दिखाए हैं। उन्होंने घोषणा की है कि अब चाहे कुड़मी हों, कन्वर्टेड क्रिश्चियन हों या कोई और, जो भी आदिवासी आरक्षण में सेंध लगाने की कोशिश करेगा, उससे हिसाब किया जाएगा।
आदिवासी अस्मिता की नई ताकत
कल तक जो आवाज़ अकेली थी, आज वह पूरे समाज की ताकत बन चुकी है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि यही एकजुटता ही असली आदिवासियत है और इसी के दम पर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित किया जाएगा।
इस तरह निशा भगत अब सिर्फ एक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता की लड़ाई का चेहरा बनकर उभरी हैं।



