Chaibasa: आज 8 सितंबर को गुवा गोलीकांड की 45वीं बरसी पर शहीद हुए आदिवासियों को याद किया गया। यह वही काला दिन है जब 8 सितंबर 1980 को तत्कालीन बिहार मिलिट्री पुलिस (बीएमपी) के जवानों ने गुवा अस्पताल से 8 आदिवासी युवकों को बाहर निकालकर लाइन में खड़ा किया और उन्हें एक-एक कर गोलियों से भून डाला था। इस निर्मम घटना ने पूरे झारखंड ही नहीं बल्कि देशभर में आक्रोश और दुख की लहर पैदा की थी। इसे आज भी मानवाधिकार उल्लंघन का सबसे काला अध्याय माना जाता है।
बरसी के अवसर पर आज पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा गुवा पहुंचे। उन्होंने शहीद स्थलों पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया और उनके बलिदान को झारखंड की अस्मिता से जुड़ा करार दिया। अर्जुन मुंडा ने कहा कि गुवा गोलीकांड सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि झारखंड आंदोलन के इतिहास का निर्णायक मोड़ रहा, जिसने आदिवासी समाज को अपनी पहचान और अधिकार की लड़ाई लड़ने के लिए और सशक्त किया।
इस मौके पर पश्चिम सिंहभूम की पूर्व सांसद गीता कोड़ा भी मौजूद रहीं। उन्होंने शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि गुवा गोलीकांड की पीड़ा आज भी झारखंड के लोगों के दिलों में ताजा है। यह सिर्फ शहादत की याद नहीं, बल्कि न्याय और अधिकार के लिए आदिवासी संघर्ष की प्रतीक है।
स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में इस अवसर पर जुटे और शहीदों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। वक्ताओं ने इस घटना को राज्य के इतिहास में दर्ज अन्यायपूर्ण और अमानवीय कृत्य बताते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों को भी इस बलिदान से सीख लेनी चाहिए।
पृष्ठभूमि:
गुवा गोलीकांड झारखंड आंदोलन के दौरान उस समय हुआ जब लोग अपने अधिकारों और संसाधनों पर दावे की लड़ाई लड़ रहे थे। इस दौरान प्रशासनिक दमन की कार्रवाई में बीएमपी के जवानों ने अस्पताल में भर्ती आदिवासियों को बाहर निकालकर गोलियों से मौत के घाट उतार दिया। इस निर्मम नरसंहार ने झारखंड अलग राज्य की मांग को और प्रबल किया और आगे चलकर यह झारखंड आंदोलन का अहम अध्याय बन गया।



