Ranchi : रांची विश्वविद्यालय में पीएचडी एडमिशन को लेकर पिछले दो वर्षों से बनी अनिश्चितता अब गंभीर चिंता का विषय बन गई है। सत्र 2024–25 के तहत 463 सीटों पर नामांकन के लिए नवंबर 2024 में आवेदन प्रक्रिया शुरू की गई थी। इस दौरान 2374 अभ्यर्थियों ने प्रति व्यक्ति 2000 रुपये शुल्क जमा किया, जिससे कुल 47.48 लाख रुपये विश्वविद्यालय के पास जमा हो गए। लेकिन अब तक न तो प्रवेश परीक्षा आयोजित की गई है और न ही अभ्यर्थियों को उनकी फीस वापस की गई है।
समय बीतने के साथ अभ्यर्थियों का धैर्य जवाब देने लगा है। लगातार दो साल बीत जाने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई ठोस जानकारी या समयसीमा नहीं दी गई है। छात्र यह जानना चाहते हैं कि उनकी परीक्षा कब होगी या उन्हें उनका पैसा कब लौटाया जाएगा। इस मुद्दे को लेकर कई छात्र संगठनों ने भी आवाज उठाई है, लेकिन प्रशासन की चुप्पी ने समस्या को और गंभीर बना दिया है।
इस मामले ने नया मोड़ तब लिया जब अगस्त 2025 में राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार के निर्देश पर पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई। निर्देश में कहा गया कि विश्वविद्यालय को यूजीसी गाइडलाइन-2022 के अनुसार ही एडमिशन प्रक्रिया पूरी करनी होगी। नई व्यवस्था के तहत अब केवल नेट और जेट क्वालिफाइड अभ्यर्थियों के आधार पर नामांकन किया जाना है, जिससे पहले से चल रही प्रक्रिया अधर में लटक गई।
इस बदलाव के कारण हजारों छात्र असमंजस की स्थिति में फंस गए हैं। जिन अभ्यर्थियों ने पहले ही आवेदन कर दिया था, वे अब यह समझ नहीं पा रहे कि उनका क्या होगा। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस स्थिति को लेकर अब तक कोई स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं आया है, जिससे छात्रों की चिंता और बढ़ती जा रही है।
हालांकि विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार गुरु चरण साहू का कहना है कि इस मामले से कुलपति को अवगत करा दिया गया है और लोकभवन से दिशा-निर्देश मिलने के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। वहीं, पीआरओ डॉ. स्मृति सिंह ने भी कहा कि समस्या के समाधान के लिए एक कमेटी गठित की गई है, जो इस दिशा में काम कर रही है।
दूसरी ओर, अभ्यर्थियों का आरोप है कि यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है। कई छात्रों का कहना है कि पहले उनसे शुल्क लिया गया और बाद में नियमों का हवाला देकर प्रक्रिया रोक दी गई, जिससे वे मानसिक और आर्थिक रूप से प्रभावित हुए हैं। रांची विश्वविद्यालय के पूर्व सीनेट और सिंडिकेट सदस्य डॉ. अटल पांडे ने भी इस स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों को अनिश्चितता में रखना अनुचित है।
यदि विषयवार सीटों की बात करें तो इतिहास, हिंदी, मनोविज्ञान, बॉटनी और अर्थशास्त्र सहित कई विषयों में सीटें निर्धारित की गई थीं, लेकिन अब तक किसी में भी नामांकन नहीं हो सका है। पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि इस समस्या का समाधान कब निकलेगा। फिलहाल 2374 अभ्यर्थी अपने भविष्य को लेकर सिर्फ इंतजार कर रहे हैं और विश्वविद्यालय के अगले कदम पर उनकी नजर टिकी हुई है।


