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जिस जमीन के लिए दी जान, उसी धरती पर शहीद सोमा मुंडा को पत्थलगड़ी से श्रद्धांजलि

Khunti: खूंटी जिला अंतर्गत हूटार स्थित जियारप्पा में उस जमीन पर, जिसके विवाद को लेकर पड़हा राजा शहीद सोमा मुंडा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, आज उनकी स्मृति में पारंपरिक रीति से पत्थलगड़ी की जा रही है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पड़हा, मुंडा, मानकी एवं समाज के लोग उपस्थित रहे। आयोजन स्थल पर सुबह से ही लोगों के पहुंचने का सिलसिला जारी है।

ज्ञात हो कि जनवरी माह के शुरुआती सप्ताह में अपराधियों ने सोमा मुंडा की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना के विरोध में आक्रोशित ग्रामीणों ने अपराधियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर खूंटी बंद कराया था, जिसके बाद झारखंड बंद भी किया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस लगातार छापेमारी करती रही और अलग-अलग तिथियों में अब तक कुल 14 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। गिरफ्तार आरोपियों में जमीन कारोबार से जुड़े लोग शामिल बताए गए हैं, जिनमें एक मुख्य शूटर भी है। हालांकि मामले में पुलिस अनुसंधान अभी भी जारी है।

संघर्ष की धरती पर स्मारक पत्थलगड़ी

सोमा मुंडा के परिजनों और समाज के लोगों ने उसी जमीन पर पत्थलगड़ी कर उनके संघर्ष और बलिदान को अमर करने का निर्णय लिया, जिसे बचाने के लिए वे वर्षों से आंदोलनरत थे। पत्थर पर उनके जीवन, विचार और संघर्ष की विस्तृत गाथा अंकित की गई है।

पत्थलगड़ी स्थल पर अंकित है:

“जय पड़हा! जय सिंगबोंगा!”

जतरा टांड़ जियारप्पा, खूंटी (झारखंड)

एदेल संगा – 22 पड़हा, 56 मौजा

पड़हा राजा – शहीद सोमा मुंडा

पिता – स्व० बुल मुंडा | ग्राम – चलागी

शिक्षा और वैचारिक जागरण से शुरुआत

सोमा मुंडा ने छात्र जीवन से ही शिक्षा और वैचारिक जागरण को प्राथमिकता दी। हूटार में होड़ो सेंड़ा स्कूल का संचालन किया तथा 1988 में चलागी में बिरसा उच्च विद्यालय की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई। 1989-90 से उन्होंने पड़हा व्यवस्था के पुनर्जागरण और ग्राम गणराज्य की अवधारणा को मजबूत करने का अभियान शुरू किया। 1992 से जनी शिकार जतरा के पुनर्जीवन और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन का कार्य भी किया।

झारखंड आंदोलन में सक्रिय भूमिका

उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर झारखंड आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा तथा एन.ई. होरो जैसे नेताओं की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। 1932 के खतियान आधारित स्थानीय नीति, रोजगार नीति और डोमिसाइल आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। सरना धर्म कोड की मांग को लेकर भी वे मुखर रहे।

जल, जंगल, जमीन के लिए आजीवन संघर्ष

सोमा मुंडा ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा को अपना जीवन समर्पित किया। कोयलकारो परियोजना, CNT एक्ट संशोधन (2016), ग्रेटर रांची योजना, त्रुटिपूर्ण ड्रोन सर्वे, अवैध बालू घाट नीलामी और विभिन्न औद्योगिक परियोजनाओं का विरोध किया। विस्थापन और पर्यावरणीय क्षति के खिलाफ वे लगातार आवाज उठाते रहे। ग्रामसभा सशक्तिकरण, स्थानीय बाजार पर सामुदायिक नियंत्रण और खनिज संपदा पर ग्रामीणों के अधिकार के मुद्दे पर भी वे संघर्षरत रहे।

सांस्कृतिक अस्मिता और सामाजिक सुधार

उन्होंने मुंडा समाज की एकता, नशा उन्मूलन अभियान, करम अखाड़ा (खूंटी) की स्थापना, मुंडारी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तथा सामूहिक सरहुल-करमा महोत्सव की शुरुआत जैसे सांस्कृतिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

साथ ही, बिरसा मुंडा, गया मुंडा, रिसा मुंडा, सुतिया मुंडा और अन्य महापुरुषों की विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य किया तथा विभिन्न गोलीकांडों के शहीदों को सदैव नमन किया।

“बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा”

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित पड़हा, मुंडा और मानकी प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि सोमा मुंडा का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा। जल-जंगल-जमीन की रक्षा और ग्राम स्वशासन की लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।

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