Ranchi: रांची के कार्निवल बैंक्वेट हॉल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित जनजातीय संवाद कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आदिवासी समाज को एकजुट होकर अपनी समस्याओं का समाधान करने का आह्वान किया। इस कार्यक्रम में बिहार-झारखंड के लगभग एक हजार जनजाति समाज से जुड़े लोग मौजूद रहे। दो सत्रों में चले इस संवाद में राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के लोगों ने आदिवासियों की समस्याओं और उनके समाधान पर खुलकर विचार व्यक्त किए।
पहले सत्र में उठे गंभीर मुद्दे: धर्मांतरण, जमीन विवाद और आरक्षण
सुबह 10:30 बजे शुरू हुए पहले सत्र में उपस्थित जनजाति समाज के लोगों ने धर्म परिवर्तन, बाहरी घुसपैठ, डी-लिस्टिंग, जनजातियों के आरक्षण, पेसा कानून की खामियों और भूमि विवाद जैसे विषयों पर सवाल उठाए।
इस सत्र में कहा गया कि सीएनटी/एसपीटी कानून का उल्लंघन कर जनजातीय जमीन की खरीद-फरोख्त की जा रही है। इसके अलावा, ईसाई और मुस्लिम समुदायों द्वारा कथित धर्मांतरण, पेसा कानून का सही तरीके से लागू न होना, ग्रामसभा की शक्तियों को कमजोर करना तथा जनजातीय महिलाओं और युवतियों के सामाजिक- सांस्कृतिक शोषण जैसे मुद्दे भी चर्चा में आए।
वक्ताओं ने सुझाव दिया कि धर्मांतरित जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण पर पुनर्विचार किया जाए। साथ ही जनजातीय महिलाओं के जाति प्रमाण पत्र उनकी मूल पहचान के आधार पर जारी किए जाएं। संथाल परगना क्षेत्र में जनजातीय जमीन की सुरक्षा के लिए परंपरागत व्यवस्था को सख्ती से लागू करने की भी मांग की गई।
दूसरे सत्र में मोहन भागवत का संबोधन: “जनजाति और हिंदू समाज अलग नहीं”
दूसरे सत्र में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि आदिवासी समाज और हिंदू समाज अलग नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू कोई पूजा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है, जिसमें विविधताओं के बावजूद एकता का भाव निहित है।
भागवत ने कहा कि भारत की सभ्यता हजारों वर्षों से जंगल, खेती और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ी है और वेदों व उपनिषदों की मूल भावना इसी जीवन पद्धति से जुड़ी है। उन्होंने बताया कि पृथ्वी माता सभी भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों का पालन करने वाली है, इसलिए विविधता का सम्मान हमारी परंपरा है।
उन्होंने कहा कि धर्म का मूल अर्थ सत्य, सेवा, परोपकार और संयम है। जब समाज भोग और स्वार्थ में उलझता है तो आपसी मतभेद बढ़ते हैं और बाहरी आक्रांताओं को फायदा मिलता है। उन्होंने कहा कि विश्व में एक ही धर्म है, मानव धर्म, और यही हिंदू धर्म का मूल स्वरूप है।
एकजुटता पर जोर: “सरना को अलग धर्म मानना समाज तोड़ने की कोशिश”
मोहन भागवत ने जनजातीय समाज को चेताते हुए कहा कि अगर समाज बंटेगा तो कमजोर होगा, लेकिन एकजुट रहेगा तो कोई शक्ति उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती। उन्होंने सरना को पूजा पद्धति बताते हुए कहा कि इसे अलग धर्म मानना समाज को तोड़ने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य समाज को जोड़ना है, विभाजित करना नहीं।
शिक्षा, रोजगार और संस्कृति: “बच्चों को अपनी जड़ों की शिक्षा दें”
भागवत ने जनजातीय समाज की शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को प्रारंभिक उम्र से ही अपनी संस्कृति, परंपरा और गौरव की शिक्षा दी जानी चाहिए, ताकि वे कभी भटके नहीं और अगर भटके भी तो अपनी जड़ों की ओर वापस लौट आएं।
उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा जैसे महापुरुषों को समाज की धरोहर बताते हुए कहा कि उनके विचारों से सभी को परिचित होना चाहिए।
समस्याओं का सामना संगठित होकर करें: “आत्मनिर्भर बनें”
भागवत ने कहा कि जनजातीय भूमि की रक्षा, श्रम करने वालों की प्रतिष्ठा, स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और सामाजिक समरसता समय की आवश्यकता है। उन्होंने धर्मांतरण, जमीन हड़पने, सामाजिक शोषण और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना संगठित होकर करने की बात कही।
उन्होंने समाज से अपील की कि वे आत्मनिर्भर बनें, अपने स्वाभिमान को जागृत करें और किसी बाहरी शक्ति पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति छोड़ें।
कार्यक्रम में कई नेता और जनजातीय संगठन मौजूद
जनजातीय संवाद कार्यक्रम में क्षेत्र संघचालक देवव्रत पाहन, पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा, चंपाई सोरेन, पद्मश्री अशोक भगत, गीता कोड़ा सहित कई सामाजिक कार्यकर्ता और जनजातीय समाज के लोग उपस्थित रहे।
पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने संघ प्रमुख की चिंता को सही बताया और कहा कि वे पहले से ही लोगों को आगाह करते रहे हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री मधुकोड़ा ने कहा कि इस संवाद में आदिवासियों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर खुलकर चर्चा हुई और समाधान के लिए सुझाव दिए गए।
समाप्ति में आईआरएस अधिकारी निशा उरांव का संदेश: “विविधता में एकता”
कार्यक्रम के बाद मीडिया से बात करते हुए आईआरएस अधिकारी निशा उरांव ने कहा कि संघ प्रमुख ने सबसे बड़ा संदेश यह दिया कि भारत का मूल धर्म विविधता में एकता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को सामने मौजूद चुनौतियों का सामना करने के लिए समाज को आगे आकर एकजुट होना होगा, क्योंकि कोई एक समुदाय या संगठन अकेले इसे दूर नहीं कर सकता।



