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पलामू में विदेशी मेहमानों का जमावड़ा, कमलदह झील बनी प्रवासी पक्षियों की पसंदीदा जगह

palamu : पलामू, गढ़वा और लातेहार जिलों में इन दिनों विदेशी मेहमानों की चहचहाहट से प्राकृतिक सौंदर्य और बढ़ गया है। हजारों किलोमीटर का सफर तय कर प्रवासी पक्षी यहां की झीलों, नदियों और तालाबों को अपना अस्थायी बसेरा बना रहे हैं। नवंबर महीने से इन पक्षियों का आगमन शुरू होता है, जो मार्च तक यहां रुकते हैं और फिर अपने मूल स्थानों की ओर लौट जाते हैं।

180 से अधिक प्रजातियों ने बनाया ठिकाना

वन विभाग के सर्वे के अनुसार, पलामू प्रमंडल में 180 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के पक्षी पहुंचे हैं। इनमें अधिकांश प्रवासी पक्षी साइबेरिया, रूस और यूरोपीय देशों से आते हैं। ठंड के मौसम में अनुकूल जलवायु और पर्याप्त भोजन मिलने के कारण यह क्षेत्र इनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन जाता है।

कई विदेशी प्रजातियों की मौजूदगी

पलामू, गढ़वा और लातेहार क्षेत्र में यूरेशियन गौरैया, नॉर्दन पिनटेल, कॉमन टील, शेल्डक, गडवाल, किंगफिशर, बैरेड हेडेड गूज सहित कई विदेशी प्रजातियां देखी जा रही हैं। साइबेरिया, यूरोप और तिब्बत क्षेत्र से आने वाले लार्क, जिन्हें स्थानीय भाषा में बगेरी कहा जाता है, धान के खेतों में नजर आते हैं। हालांकि, शिकार के कारण इनकी संख्या पर भी असर पड़ा है।

कमलदह झील बना सबसे बड़ा केंद्र

पलामू टाइगर रिजर्व के अंतर्गत बेतला नेशनल पार्क स्थित कमलदह झील प्रवासी पक्षियों का सबसे बड़ा ठिकाना बनकर उभरी है। इसके अलावा सोन, कोयल, अमानत नदी, अनराज डैम और मलय डैम में भी बड़ी संख्या में पक्षी देखे जा रहे हैं। कमलदह झील का ऐतिहासिक महत्व भी है, जिसका निर्माण चेरो राजवंश के समय हुआ था और तभी से यह पक्षियों के लिए आकर्षण का केंद्र रही है।

निगरानी और सुरक्षा बढ़ाई गई

प्रवासी पक्षियों को लेकर वन विभाग अलर्ट मोड में है। उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई है और नियमित निगरानी की जा रही है। पक्षियों की मूवमेंट, ट्रेल और संख्या का आकलन किया जा रहा है। पीटीआर के उपनिदेशक प्रजेशकांत जेना के अनुसार, कमलदह झील में 12 से 15 विभिन्न विदेशी प्रजातियों के पक्षी मौजूद हैं, वहीं आसपास के जलस्रोतों में भी इनकी अच्छी-खासी संख्या है।

शिकार से घट रही संख्या चिंता का विषय

पिछले एक दशक में पलामू क्षेत्र में प्रवासी पक्षियों की संख्या में गिरावट देखी गई है। मंगोलिया, तिब्बत, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान से आने वाले बैरेड हेडेड गूज (स्थानीय नाम चकवा-चकई) का सबसे अधिक शिकार हुआ है। पहले कोयल नदी इनका बड़ा ठिकाना हुआ करती थी, लेकिन अब ये सीमित संख्या में ही दिखाई देते हैं। शिकार पर रोक और संरक्षण के प्रयासों की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही है।

प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी न केवल पलामू की जैव विविधता को समृद्ध करती है, बल्कि पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी इस क्षेत्र को खास बनाती है।

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