Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा नगर निगमों को दो वर्गों—वर्ग ‘क’ और वर्ग ‘ख’—में बांटने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए सरकार तथा राज्य चुनाव आयोग दोनों से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि 17 नवंबर तक यह स्पष्ट किया जाए कि क्या नगर निगमों का यह वर्गीकरण संविधान के अनुरूप है या नहीं। यह याचिका शांतनु कुमार चंद्रा की ओर से दायर की गई है।
याचिकाकर्ता के तर्क और संवैधानिक आधार पर आपत्ति
प्रार्थी पक्ष की ओर से अधिवक्ता विनोद सिंह ने दलील दी कि संविधान में नगर निगमों के वर्गीकरण का कोई भी प्रावधान मौजूद नहीं है। ऐसे में सरकार कार्यपालक आदेश जारी कर दो वर्गों का निर्माण नहीं कर सकती। उन्होंने अदालत को बताया कि निकाय चुनाव की तैयारी के तहत राज्य के नौ नगर निगमों को दो भागों में बांटा गया है—वर्ग ‘क’ में केवल रांची और धनबाद को शामिल किया गया है, जबकि शेष नगर निगमों को वर्ग ‘ख’ में रखा गया है। अधिवक्ता ने इसे संविधान के विपरीत बताते हुए पूरी प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगाया।
धनबाद और गिरिडीह में आरक्षण नीति पर भी आपत्ति
याचिका में न केवल वर्गीकरण बल्कि मेयर पद के आरक्षण को लेकर भी सरकार की नीति को चुनौती दी गई है। प्रार्थी ने दलील दी कि वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर नगर निकाय चुनाव कराए जाने हैं, और इसी के अनुसार धनबाद में अनुसूचित जाति की आबादी करीब दो लाख है। ऐसे में धनबाद मेयर पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होना चाहिए था, लेकिन इसे अनारक्षित कर दिया गया। दूसरी ओर गिरिडीह में अनुसूचित जाति की आबादी मात्र 30,000 होने के बावजूद मेयर पद को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। प्रार्थी ने इस निर्णय को मनमाना और संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध बताया।
अगली सुनवाई में सरकार को पेश करना होगा स्पष्ट रुख
अदालत ने कहा कि सरकार और चुनाव आयोग दोनों को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि इस वर्गीकरण का संवैधानिक और कानूनी आधार क्या है। मामले की अगली सुनवाई से पहले दोनों पक्षों का विस्तृत जवाब दाखिल करना अनिवार्य है। इस पूरे प्रकरण ने नगर निकाय चुनाव और उनकी संरचना से जुड़े निर्णयों पर व्यापक बहस छेड़ दी है।



