Ranchi: झारखंड बीजेपी में हाल ही हुए संगठनात्मक बदलाव ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। रवींद्र राय की जगह आदित्य साहू को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ को लेकर कयास तेज हो गए हैं। साहू ओबीसी समाज से आते हैं और उनकी नियुक्ति जातिगत संतुलन की रणनीति के रूप में देखी जा रही है।
सवाल यह उठ रहा है कि क्या आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष की कमान पूरी तरह सौंप दी जाएगी या पार्टी किसी नए चेहरे पर विचार कर रही है। रवींद्र राय के पहले से ही कार्यकारी अध्यक्ष होने के बावजूद साहू को उनकी जगह पर बिठाने से संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी संगठन में बदलाव और ओबीसी प्रतिनिधित्व को मजबूत करना चाहती है।
पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास और बाबूलाल मरांडी जैसी कद्दावर नेताओं की मौजूदगी साहू के लिए चुनौती है। जानकार मानते हैं कि साहू को पार्टी में वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलना होगा। वहीं, साहू की सरल छवि और संगठन में पैठ को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
आदित्य साहू की पृष्ठभूमि रांची जिले के कुचू गांव की है। वे 20 साल से बीजेपी से जुड़े हैं और पहले प्रदेश महासचिव रह चुके हैं। राम तहल चौधरी कॉलेज में शिक्षक रह चुके साहू राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। उनके नजदीकी पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से बताए जाते हैं।
संगठनात्मक बदलाव का संकेत 3 अक्टूबर 2025 को साहू को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने में दिखाई दिया। इसे पार्टी के भीतर ओबीसी वोट बैंक मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि साहू को पहले कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर बाद में प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है।
भाजपा के सामने बड़ी परीक्षा आगामी घाटशिला उपचुनाव है। आदित्य साहू को बड़े नेताओं को साथ लेकर संगठन मजबूत करना होगा। अगर साहू इस चुनौती में सफल रहते हैं तो पार्टी झारखंड में अपने संगठनात्मक आधार को मजबूत कर सकती है। रघुवर दास और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ तालमेल साहू की अगली राजनीतिक उपलब्धियों की कुंजी साबित होगी।



