Ranchi : वर्ष 2023 में झारखंड सरकार द्वारा शुरू की गई मुख्यमंत्री फेलोशिप योजना अब अपने लक्ष्य और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच बड़े अंतर को लेकर सवालों के घेरे में आ गई है। मेधावी शोधार्थियों को आर्थिक सहायता देने के उद्देश्य से शुरू की गई इस योजना का लक्ष्य प्रतिवर्ष 1000 विद्यार्थियों को लाभ पहुंचाना था, लेकिन तीन वर्षों बाद भी इसका लाभ सीमित संख्या में छात्रों तक ही पहुंच सका है।
आंकड़ों के अनुसार अब तक लगभग 150 शोधार्थियों को ही इस योजना का लाभ मिला है। यानी कुल लक्ष्य का महज करीब 15 प्रतिशत ही पूरा हो सका है। ऐसे में योजना की पहुंच, क्रियान्वयन और जागरूकता को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं।
सरकार ने इस योजना की शुरुआत अगस्त 2023 में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में की थी। शुरुआती चरण में 50 विद्यार्थियों को फेलोशिप दी गई थी। इसके बाद 2024 और 2025 में आवेदन प्रक्रिया जारी रही, लेकिन लाभार्थियों की संख्या अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ सकी। वर्ष 2026 के लिए आवेदन प्रक्रिया अभी जारी है, इसलिए अंतिम आंकड़े और बढ़ सकते हैं।
इस योजना के तहत पीएचडी कर रहे विद्यार्थियों को चार वर्षों तक वित्तीय सहायता दी जाती है। यूजीसी-नेट और सीएसआईआर-नेट उत्तीर्ण शोधार्थियों को 25 हजार रुपये प्रतिमाह, जबकि जेईटी उत्तीर्ण विद्यार्थियों को 22,500 रुपये प्रतिमाह स्टाइपेंड प्रदान किया जाता है। सरकार का उद्देश्य राज्य में शोध को बढ़ावा देना और आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को सहारा देना है।
हालांकि कई लाभार्थी इस योजना को सकारात्मक पहल मानते हैं, लेकिन स्टाइपेंड की राशि को लेकर असंतोष भी सामने आया है। कुछ शोधार्थियों का कहना है कि मौजूदा महंगाई के दौर में 25 हजार रुपये प्रतिमाह पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए इसे बढ़ाकर 35 हजार रुपये करने की मांग की जा रही है।
शिक्षाविदों का मानना है कि योजना की दिशा सही है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एसएन मुंडा के अनुसार यदि योजना का लाभ सभी पात्र विद्यार्थियों तक पहुंचे और शोध का मजबूत वातावरण तैयार हो तो इसका सकारात्मक असर व्यापक रूप से दिखाई देगा।
वहीं, शोधार्थियों का कहना है कि कई विश्वविद्यालयों में गाइड और प्रोफेसरों की कमी के कारण पीएचडी में नामांकन ही सीमित है। इसके चलते फेलोशिप योजना का दायरा भी प्रभावित हो रहा है। कुछ विश्वविद्यालयों में जानकारी के अभाव के कारण भी विद्यार्थी इस योजना से वंचित रह जाते हैं।
इस मामले में तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग के प्रधान सचिव राहुल पुरवार ने कहा कि योजना पूरी तरह ऑनलाइन प्रक्रिया पर आधारित है और पात्रता के आधार पर लाभ दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि 2026 के लिए आवेदन प्रक्रिया जारी है और आने वाले समय में लाभार्थियों की संख्या बढ़ने की संभावना है।
कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री फेलोशिप योजना आर्थिक रूप से कमजोर शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल जरूर है, लेकिन निर्धारित लक्ष्य और वास्तविक लाभार्थियों की संख्या के बीच बड़ा अंतर इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़ा करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक संसाधन, जागरूकता और शोध ढांचे को मजबूत करना भी जरूरी है।


