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10 महीने बाद भी नहीं बनी साहित्य, कला और नाटक अकादमी, झारखंड सरकार पर उठे सवाल

Ranchi : झारखंड में साहित्य, कला और संस्कृति के विकास के लिए प्रस्तावित तीन महत्वपूर्ण अकादमियों का गठन अब तक नहीं हो पाया है। सितंबर 2025 में राज्य कैबिनेट द्वारा मंजूरी मिलने के करीब 10 महीने बाद भी झारखंड राज्य साहित्य अकादमी, झारखंड राज्य ललित कला अकादमी और झारखंड राज्य संगीत नाटक अकादमी केवल कागजों तक सीमित हैं। इस देरी को लेकर कलाकारों, साहित्यकारों और राजनीतिक दलों के बीच सवाल उठने लगे हैं।

राज्य गठन के 25 वर्षों बाद इन अकादमियों के गठन की घोषणा को कला और संस्कृति के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल माना गया था। सरकार के इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ था और उम्मीद जताई गई थी कि इससे स्थानीय कलाकारों, लेखकों और सांस्कृतिक संस्थाओं को नया मंच मिलेगा। हालांकि, लंबे इंतजार के बाद भी कोई ठोस प्रगति नहीं होने से निराशा बढ़ रही है।

मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। भाजपा ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि कैबिनेट के फैसलों को लागू करने में गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है। पार्टी का आरोप है कि सरकार घोषणाएं तो करती है, लेकिन उन्हें धरातल पर उतारने में विफल रहती है।

भाजपा प्रवक्ता अजय साह ने कहा कि सरकार की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई महत्वपूर्ण योजनाओं की तरह अकादमियों के गठन का फैसला भी अब तक अधूरा पड़ा हुआ है। उनके अनुसार, यदि कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद भी योजनाएं लागू नहीं होती हैं, तो इससे सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े होते हैं।

वहीं, कांग्रेस ने सरकार का बचाव करते हुए कहा है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने कभी भी ऐसी अकादमियों के गठन की दिशा में पहल नहीं की। कांग्रेस नेता जगदीश साहू ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मंशा स्पष्ट है और कुछ तकनीकी कारणों से प्रक्रिया में देरी हुई है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि जल्द ही अकादमियों का गठन कर कला एवं संस्कृति के क्षेत्र को नई दिशा दी जाएगी।

जानकारी के अनुसार, अकादमियों के गठन में कुछ प्रशासनिक और तकनीकी मुद्दे अटके हुए हैं। कैबिनेट के प्रस्ताव में अध्यक्ष, सचिव और सदस्यों की नियुक्ति, उनकी योग्यता तथा कार्यकाल संबंधी प्रावधान तय किए गए थे। बताया जा रहा है कि सरकार इन मानदंडों और सदस्यों की संख्या को लेकर पुनर्विचार कर रही है, जिसके कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि साहित्य, संगीत, नाटक और ललित कला के संरक्षण और संवर्धन के लिए ऐसी संस्थाओं का गठन बेहद जरूरी है। पड़ोसी राज्यों में लंबे समय से अकादमियां सक्रिय हैं और कलाकारों को मंच उपलब्ध करा रही हैं। ऐसे में झारखंड में भी इन अकादमियों का जल्द गठन राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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