Dhanbad: बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय बहु-विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने जैविक नवाचारों के जरिए हरित उद्यमिता और सतत आजीविका को बढ़ावा देने पर गहन चर्चा की। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में विकसित तकनीकों को सीधे किसानों, ग्रामीण युवाओं और आम लोगों तक पहुंचाना था, ताकि वैज्ञानिक शोध का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके।
“जैविक नवाचारों के माध्यम से हरित उद्यमिता और सतत आजीविका का संवर्धन” विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में देश के कई राज्यों से विशेषज्ञ पहुंचे। कार्यक्रम में जूलॉजी, बॉटनी, बायोटेक्नोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी और पर्यावरण विज्ञान जैसी जीव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं को एक साझा मंच पर लाया गया। सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि शोध केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका सीधा उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और रोजगार सृजन में होना चाहिए।
कार्यक्रम के आयोजक प्रो शैलेंद्र कुमार सिन्हा ने कहा कि इस सम्मेलन का उद्देश्य “लैब टू लैंड” यानी प्रयोगशाला से खेत और गांव तक तकनीक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि खेती, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, लाह उत्पादन, रेशम उद्योग और कुटीर उद्योग जैसे क्षेत्रों में स्वरोजगार की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। सम्मेलन में मिले सुझावों और निष्कर्षों को संकलित कर झारखंड सरकार को भेजा जाएगा, ताकि उन्हें जमीनी स्तर पर लागू किया जा सके।
चेन्नई से पहुंचे एसोसिएट प्रोफेसर डॉ जय जयंती ने कहा कि आज युवाओं को टिकाऊ कृषि प्रणाली यानी सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि खेती को आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जोड़ा जाए, तो कृषि को अधिक लाभकारी और आकर्षक बनाया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि AI का इस्तेमाल जिम्मेदारी और जागरूकता के साथ होना चाहिए, ताकि तकनीक किसानों के लिए सहायक साबित हो सके।
भारतीय कृषि संस्थान की वैज्ञानिक डॉ अर्चना कांति दास ने कहा कि विज्ञान को समाज और शोध को नीतियों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने बताया कि झारखंड में आदिवासी, महिलाएं और विस्थापित परिवारों को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए कई परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि परित्यक्त खदानों और जलाशयों का उपयोग मत्स्य पालन के लिए किया जा रहा है और “केज कल्चर” तकनीक के माध्यम से राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है।
सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के डॉ मंजय प्रसाद सिन्हा ने जैविक खेती और कृमि खाद पर अपने शोध साझा किए। उन्होंने कहा कि जैविक अपशिष्ट प्रबंधन और प्राकृतिक खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे खेती की लागत घटेगी और किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी।
वहीं बिलासपुर विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ नरेंद्र कुमार भाटिया ने कहा कि शिल्प आधारित कुटीर उद्योग ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए आय का मजबूत स्रोत बन सकते हैं। यदि स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक कौशल को आधुनिक बाजार और तकनीक से जोड़ा जाए, तो छोटे उद्योग भी बड़े आर्थिक अवसर पैदा कर सकते हैं। सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी कि विज्ञान, तकनीक और स्थानीय संसाधनों के बेहतर समन्वय से ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।


