Ranchi : झारखंड के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला प्रसिद्ध जंगली सुपरफूड रुगड़ा (Rugda) जल्द ही भौगोलिक संकेतक (GI Tag) की पहचान हासिल कर सकता है। अपनी अनूठी स्वाद, सीमित उपलब्धता और औषधीय गुणों के कारण रुगड़ा न सिर्फ झारखंड बल्कि देशभर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। मानसून की शुरुआत के साथ ही जंगलों में मिलने वाला यह दुर्लभ खाद्य पदार्थ आदिवासी समुदाय की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
रुगड़ा केवल जून और जुलाई के दौरान प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे खेतों या किसी कृषि तकनीक के माध्यम से उगाया नहीं जा सकता। यह पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर वन उपज है, जो विशेष प्रकार की मिट्टी और मौसम में स्वतः विकसित होती है। इसी कारण इसकी उपलब्धता बेहद सीमित रहती है और बाजार में इसकी मांग हमेशा अधिक बनी रहती है।
स्थानीय बाजारों में रुगड़ा की कीमत कई बार 1000 से 1200 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती है। इसके बावजूद लोग इसे खरीदने के लिए उत्सुक रहते हैं। झारखंड के रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां और आसपास के जंगलों से बड़ी मात्रा में रुगड़ा एकत्र कर बाजारों में बेचा जाता है। यह कई आदिवासी परिवारों के लिए मानसून के मौसम में आय का महत्वपूर्ण स्रोत भी बनता है।
रुगड़ा का स्वाद पकने के बाद बेहद खास होता है। इसका स्वाद और बनावट मटन से काफी मिलती-जुलती है, इसलिए इसे “शाकाहारियों का मटन” भी कहा जाता है। इसे मसालेदार तरीके से पकाकर सब्जी बनाई जाती है, जो झारखंड के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। बरसात के मौसम में इसकी मांग इतनी अधिक होती है कि बाजार में आते ही यह हाथों-हाथ बिक जाता है।
स्वाद के साथ-साथ रुगड़ा अपने औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम और कई आवश्यक खनिज तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार रुगड़ा कई गंभीर बीमारियों, विशेषकर कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ने में भी सहायक माना जाता है। हालांकि, इसके चिकित्सीय लाभों पर अभी और वैज्ञानिक शोध जारी हैं।
रुगड़ा को GI टैग मिलने की दिशा में प्रयास तेज हो गए हैं। यदि इसे यह दर्जा मिलता है तो झारखंड की इस पारंपरिक वन उपज को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। साथ ही स्थानीय आदिवासी समुदायों, वन उत्पाद संग्रहकर्ताओं और किसानों को आर्थिक लाभ मिलने के साथ इसकी गुणवत्ता और मौलिकता भी संरक्षित रहेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से रुगड़ा की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी और झारखंड की पारंपरिक खाद्य विरासत को वैश्विक पहचान मिलेगी। यह न केवल राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगा, बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका को भी नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


