Jamshedpur : राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस के अवसर पर जमशेदपुर में आयोजित समारोह में झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने हस्तकरघा को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और आत्मनिर्भरता का मजबूत प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि हस्तकरघा सिर्फ कपड़े बनाने का माध्यम नहीं, बल्कि देश की परंपरा, कला और स्वदेशी भावना से जुड़ा हुआ है। उन्होंने इसे बढ़ावा देने और बुनकरों को प्रोत्साहित करने की जरूरत पर जोर दिया।
जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित माइकल जॉन ऑडिटोरियम में वीवर्स डेवलपमेंट एंड रिसर्च ऑर्गनाइजेशन की ओर से 13वें हस्तकरघा दिवस समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार सहित कई राज्यों से प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस दौरान बुनकरों की पारंपरिक कला के संरक्षण और लगातार लुप्त होती जा रही बुनकरी विद्या को बचाने पर चर्चा हुई।
समारोह में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कई बुनकरों को प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। राज्यपाल ने कहा कि राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस देश के लाखों बुनकरों के श्रम, कौशल और रचनात्मकता को सम्मान देने का अवसर है। इन कारीगरों ने पीढ़ियों से अपनी कला के जरिए भारत की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत रखा है।
राज्यपाल ने हस्तकरघा के ऐतिहासिक महत्व का जिक्र करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में चरखा, खादी और हस्तकरघा स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक बन गए थे। महात्मा गांधी ने खादी और स्वदेशी को जन-आंदोलन का रूप देकर लोगों में आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव की भावना पैदा की थी।
उन्होंने कहा कि झारखंड की जनजातीय और ग्रामीण परंपराओं में हस्तकरघा और हस्तशिल्प की समृद्ध विरासत मौजूद है। राज्य का तसर रेशम भी अपनी गुणवत्ता के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है। ऐसे में पारंपरिक बुनकरों और कारीगरों को नई तकनीक, आधुनिक डिजाइन और नवाचार से जोड़ना जरूरी है।
राज्यपाल ने कहा कि बुनकरों के उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए डिजिटल माध्यमों और आधुनिक मार्केटिंग का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच मिलने से बुनकरों की आय बढ़ सकती है और युवा पीढ़ी भी इस पारंपरिक कला से जुड़ने के लिए प्रेरित होगी।
संतोष कुमार गंगवार ने कहा कि प्रधानमंत्री की ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और पीएम विश्वकर्मा योजना जैसी पहल पारंपरिक कारीगरों और बुनकरों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक कला और हस्तशिल्प केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं हैं, बल्कि इन्हें आर्थिक शक्ति में बदलकर विकसित भारत के लक्ष्य में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।