Ranchi : झारखंड राज्य के गठन के साथ ही युवाओं ने बेहतर भविष्य और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था का सपना देखा था। इसी उद्देश्य से वर्ष 2002 में झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की स्थापना हुई और 2003 में पहली संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा आयोजित की गई। लेकिन पिछले 24 वर्षों में आयोग जितना अपनी नियुक्तियों के लिए चर्चा में रहा, उससे कहीं अधिक विवादों, आरोपों और कानूनी चुनौतियों के कारण सुर्खियों में रहा। आज एक बार फिर 14वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा को लेकर उठे विवाद ने JPSC की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

JPSC के इतिहास पर नजर डालें तो लगभग हर बड़ी परीक्षा किसी न किसी विवाद से जुड़ी रही है। दूसरी और तीसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में चयन प्रक्रिया, मूल्यांकन और कथित अनियमितताओं को लेकर जांच हुई। चौथी, पांचवीं और छठी परीक्षाओं में आरक्षण, कटऑफ और नियमावली पर विवाद सामने आए। सातवीं से दसवीं संयुक्त परीक्षा में लगातार रोल नंबर वाले अभ्यर्थियों के चयन और OMR शीट में कथित गड़बड़ियों के आरोप लगे, जबकि 11वीं से 13वीं परीक्षा के परिणाम भी अदालत तक पहुंचे।

वर्तमान विवाद 14वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से जुड़ा है। 103 पदों के लिए आयोजित प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम जारी होने के बाद अभ्यर्थियों ने कटऑफ सार्वजनिक नहीं करने, OMR शीट में पारदर्शिता की कमी और परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोप लगाए। विरोध बढ़ने के बाद JPSC ने मुख्य परीक्षा समेत लगभग 500 पदों से जुड़ी नौ परीक्षाओं को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया। इसके बाद छात्र संगठनों ने ‘क्लीन JPSC’ अभियान शुरू करते हुए रांची में अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू कर दिया है।

इस पूरे मामले की जांच अब अपराध अनुसंधान विभाग (CID) कर रहा है। जांच के दौरान JPSC के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व मुख्य सचिव एल. खियांग्ते से कई दौर की पूछताछ की गई है, जबकि उनका पासपोर्ट भी जब्त कर लिया गया है। वहीं, गोड्डा के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी अभय तिवारी सहित 11 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। जांच एजेंसियां ब्लैकलिस्टेड एजेंसी TDPL को परीक्षा संचालन का जिम्मा दिए जाने, OMR शीट की डबल स्कैनिंग और परीक्षा संचालन में कथित अनियमितताओं की पड़ताल कर रही हैं।

इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। भाजपा, आजसू और अन्य विपक्षी दल पूरे मामले की CBI जांच की मांग कर रहे हैं और सरकार पर भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरतने का आरोप लगा रहे हैं। भाजपा सांसदों ने संसद परिसर में मौन उपवास कर इस मुद्दे को उठाया, जबकि कई विपक्षी नेताओं ने मुख्यमंत्री से नैतिक जिम्मेदारी लेने की मांग की है। दूसरी ओर राज्य सरकार का कहना है कि शिकायत मिलते ही CID और SIT को स्वतंत्र जांच का जिम्मा सौंपा गया है तथा जांच पूरी होने तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

JPSC के खिलाफ चल रहा आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। वर्षों से तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि बार-बार विवादों और लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं के कारण उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है। कई पुराने अभ्यर्थी भी इस आंदोलन में शामिल होकर भर्ती प्रक्रिया में व्यापक सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। छात्रों का कहना है कि जब तक दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आयोग पर भरोसा बहाल नहीं हो सकेगा।

दो दशक से अधिक के सफर में JPSC ने हजारों युवाओं को प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंचाया है, लेकिन लगातार उठते विवादों ने इसकी विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। अब सबसे बड़ी चुनौती केवल मौजूदा जांच पूरी करना नहीं, बल्कि भर्ती प्रक्रिया में ऐसा भरोसा कायम करना है, जिससे मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों को निष्पक्ष अवसर मिलने का विश्वास दोबारा स्थापित हो सके।


